बिहार में भाजपा की करारी हार के पीछे रोज नए कारण तलाशे जा रहे हैं लेकिन
कुछ गलतियां ऐसी हैं जिन्हें भाजपा जानते बूझते भी कर बैठी। दिल्ली में
हार के बाद वो ही गलती बिहार में दोहरा दी गईं।
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बिहारः क्या इन 7 गलतियों से सबक ले पाएगी भाजपा
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व्यक्तिगत निशाना दिल्ली चुनावों की तरह अकेले केजरीवाल को निशाना बनाकर और उन पर व्यक्तिगत हमले करके जो गलती भाजपा ने वहां की थी वही गलती बिहार विधानसभा चुनावों में भी दोहरा दी। लालू को पीएम मोदी के साथ एनडीए के सभी नेताओं ने निशाना बनाया, अमित शाह ने तो उन्हें चारा चोर लालू तक कह दिया। नतीजा ये हुआ कि आम बिहारियों के मन में लालू के प्रति सहानभूति की लहर पैदा हो गई।
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बिहारः क्या इन 7 गलतियों से सबक ले पाएगी भाजपा
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स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बिहार चुनावों में भाजपा ने दूसरी बड़ी गलती ये की कि स्थानीय कार्यकर्ताओं को सिरे से नजरअंदाज कर दिया गया। चुनाव प्रचार से रणनीति बनाने तक हर काम में बड़े नेताओं का ही हस्तक्षेप रहा और स्थानीय नेताओं को विश्वास में नहीं लिया गया। जबकि स्थानीय स्तर के कार्यकर्ता और नेता ही चुनावों में पार्टी की हार जीत तय करते हैं। भाजपा के साथ भी यही हुआ पार्टी कार्यकर्ता पूरे मन से एनडीए उम्मीदवारों के साथ नहीं लग सके। इसी कड़ी में भाजपा ने कद्दावर नेता शत्रुघ्न सिन्हा की भी अनदेखी करके उनकी नाराजगी मोल ले ली।
बिहारः क्या इन 7 गलतियों से सबक ले पाएगी भाजपा
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विकास के मुद्दे से भटकना लोकसभा चुनावों में भाजपा ने जिस तरह नरेन्द्र मोदी के नाम पर प्रचंड जीत हासिल की उसकी एक बड़ी वजह मोदी की विकासवादी छवि भी थी। जिसे वह गुजरात में साबित कर चुके थे, लोकसभा के बाद चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी लोगों ने भाजपा को विकास के नाम पर ही वोट दिए थे लेकिन दिल्ली के बाद बिहार में भाजपा इससे भटक गई। वहां जाति-बिरादरी और अन्य मुद्दों पर ध्यान भटकाने के कारण पार्टी को हार झेलनी पड़ी।
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डीएनए जैसे आधारहीन मुद्दे उठाना बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा से शुरूआत में ही उस समय सबसे बड़ी गलती हो गई जब प्रधानमंत्री मोदी ने नीतीश के राजनीतिक डीएनए पर बेतुका बयान दे दिया। राजनीति के घाघ खिलाड़ी नीतीश ने इस बयान को तुरंत लपकते हुए इसे बिहारी अस्मिता से जोड़ दिया। नीतीश ने डीएनए के मुद्दे को इतना तूल दे दिया कि बिहार के आम आदमी तक पहुंचाकर उन्होंने इसे उनके मान सम्मान से जोड़ दिया।
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आरक्षण पर बेतुका बयान बिहार में भाजपा की हार के पीछे जो बड़ा कारण भी माना जा रहा है वो है आरक्षण पर संघ प्रमुख का दिया बयान। भागवत के इस बयान को विरोधियों खासकर लालू ने इस कदर लपका कि भाजपा को इससे पिंड छुड़ाना भारी हो गया। भाजपा ने यहां बड़ी गलती ये की कि उसने आरक्षण पर समीक्षा की बात से तो बार बार इंकार किया लेकिन खुलकर आरएसएस प्रमुख के बयान का विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखा पाई। इसे ही विरोधियों ने तूल दे दिया।
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मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजक्ट न करना बिहार में भाजपा के लिए सबसे बड़ा नुकसान ये रहा कि उसने नीतीश कुमार जैसे लोकप्रिय चेहरे के सामने पार्टी की ओर से कोई चेहरा प्रोजक्ट नहीं किया। जिससे अंदरूनी खींचतान को तो बढ़ावा मिला ही कार्यकर्ताओं में भी आत्मविश्वास नहीं आ पाया। वहीं जनता के सामने भी पहले से ही आजमाए हुए नीतीश कुमार की टक्कर में कोई दूसरा चेहरा नहीं दिखा। भाजपा अगर किसी को सीएम के तौर पर बढ़ाती तो उसकी स्थिति कुछ सुधर सकती थी।
बिहार के जातीय गणित को न समझ पाना भाजपा के सामने सबसे बड़ी मुश्किल ये रही कि वो बिहार जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्य का जातीय गणित समझने में पूरी तरह असफल रही। इसके मुकाबले लालू और नीतीश ने इसे बेहतर तरीके से समझा और उसी के अनुसार अपने उम्मीदवार घोषित किए। ये लालू यादव की दूरदर्शिता थी कि महागठबंधन ने 243 उम्मीदवारों में से 60 से ज्यादा टिकट अकेले यादवों को ही दिए। जिनमें से काफी मात्रा में जीतकर भी आए।