यूं तो कोई भी कबाड़ को सहेज कर अपने घर में नहीं रखना चाहेगा, लेकिन राजस्थान को जोधपुर शहर में रहने वाले रितेश लोहिया ने कबाड़ को घर में सजाने की चीज बना दिया है। इनके प्रोडक्ट्स देखकर आप भी इस बात पर यकीन करेंगे।
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जिसे कूड़ा समझ फेंका लोगों ने, उससे इन्होंने खड़ा किया करोड़ों का बिजनेस
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इन्होंने मंदी के दौर में अपनी पत्नी के साथ मिलकर कबाड़ से सामान बनाने की शुरुआत की और आज इनका कारोबार करीब 35 करोड़ रुपए का हो चुका है।
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2009 से पहले इनकी कंपनी का कारोबार 16 करोड़ रुपए का था।
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इसकी कंपनी में कबाड़ से कुर्सियां, अलमारी, स्टूल, मेज, बैग जैसे सामान बनाए जाते हैं।
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इनके प्रोडक्ट्स की मांग इस समय न केवल देश, बल्कि विदेश में भी खूब होती है।
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रितेश लोहिया की उम्र 39 साल है और इनकी पत्नी प्रीति की उम्र 37 साल है।
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रितेश ने अपनी कंपनी का नाम अपनी पत्नी के नाम पर प्रीति इंटरनेशनल रखा है।
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रितेश ने अपना बिजनेस शुरू तो हैंडीक्राफ्ट से किया था, लेकिन धीरे-धीरे नए आइडिया आते गए और इनका बिजनेस बढ़ता ही चला गया।
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शायद ये पति-पत्नी पहले ऐसे लोग होंगे, जो कबाड़ इकट्ठा करने का काम करके बेहद खुश होते हैं। और हों भी क्यों नहीं, कबाड़ से ही करोड़ों का कारोबार जो होता है।
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दरअसल, पहले लोहिया जी की कंपनी फर्नीचर हैंडीक्राफ्ट का निर्यात करती थी, लेकिन 2009 की मंदी से इनके कारोबार पर काफी असर हुआ। अभी इन बुरे दिनों से वो और उनकी पत्नी जूझ ही रहे थे, कि मानो एक चमत्कार ही हो गया।
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एक दिन लोहिया जी के पास डेनमार्क का एक व्यक्ति आया। फर्नीचर देखते वक्त उसकी नजर गोदाम में रखे एक टिन पर पड़ी, जिस पर किसी मजदूर ने कपड़े से बनी गद्दी रखी हुई थी। उस व्यक्ति को वह एक खास तरह की कुर्सी लगी और बहुत पसंद आई।
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उस व्यक्ति ने ही लोहिया जी को कबाड़ से ही प्रोडक्ट बनाने का आइडिया दिया। फिर क्या था, ये कबाड़ से करोड़ों का ये सफर शुरू हो गया।
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आज इनकी कंपनी कबाड़ से ऐसे-ऐसे प्रोडक्ट बनाती है, जिन्हें देखकर आप भी उन्हें घर में सजाना चाहेंगे।
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कभी मंदी की मार झेलने वाले लोहिया जी का बिजनेस आज इतना फैल गया है कि वह अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की डिमांड भी समय से पूरी नहीं कर पाते हैं।
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कुर्सी बनाने के लिए घी या तेल के डिब्बों पर बिना कोई रंग किए उस पर कपड़े की गद्दी चिपका दी जाती है। रितेश का कहना है कि इसकी डिमांड काफी अधिक होती है।
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रितेश के इस काम की वजह से कबाड़ियों के भी मजे हैं। पहले कबाड़ी जिन टिन के डिब्बों को 30-50 रुपए में दे दिया करते थे, अब उन्हीं डिब्बों की कीमत 100 रुपए कर दी गई है।
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रितेश के इस काम से उनकी आमदनी में तो बढ़ोत्तरी हुई ही है, साथ ही कबाड़ियों की आमदनी भी काफी बढ़ गई है। रितेश भी इसे अच्छा मानते हैं कि उनकी वजह से कबाड़ियों की भी आमदनी बढ़ी है।
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इनकी कंपनी में सोफा, कुर्सियां, मेज, अलमारी, दरी, कारपेट, बेडशीट, तकिए जैसे सामान बनाए जाते हैं।
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कंपनी में बनने वाले इन उत्पादों का डिजाइन रितेश की पत्नी प्रीति तैयार करती हैं।
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रितेश का कहना है कि कई बार मांग इतनी अधिक बढ़ जाती है कि कबाड़ भी नहीं मिलता है।
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कबाड़ न मिलने की स्थिति में वह बाजार से नए सामान को ही खरीदकर कबाड़ की शक्ल देते हैं।