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एक MA पास युवती, नौकरी छोड़कर अपनाई खेती, आज सैकड़ों को दे रहीं रोजगार

Fri, 01 Dec 2017 11:14 AM IST
दिव्या रावत
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Divya Rawat - फोटो : Divya Rawat
नोएडा के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा और इसके बाद इग्नू से सोशल वर्क में मास्टर डिग्री लेने के बाद मैंने यही सीखा-पहले अपना काम खुद करो, फिर दूसरों को सीख दो। मेरे पिता फौज में थे। वर्तमान में मैं देहरादून के मोथरोवाला क्षेत्र में रहती हूं, पर मेरा पुराना घर चमोली के पास कंडारा गांव में है।

पढ़ाई खत्म करने के बाद मैंने तीन साल तक दिल्ली के कई संस्थानों में नौकरी की। मैं जब पलायन की वजह से उत्तराखंड के खाली होते गांवों की खबर अखबारों में पढ़ती, तो लगता जैसे मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा हूं। मैं हमेशा सोचती थी कि कुछ ऐसा करूं, जिससे मैं अपने साथ अपने राज्य और समुदाय के दूसरे लोगों का भी सहारा बन सकूं।

मुझे एहसास हुआ कि इसके लिए मुझे नौकरी छोड़ अपने राज्य की संभावनाओं के बारे में पता लगाकर वहीं कुछ नया काम शुरू करना होगा। पहाड़ी जलवायु और परिस्थतियों के मद्देनजर मुझे मशरूम की खेती एक उपयुक्त विकल्प लगा। इसके लिए मैंने डिपार्टमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर, देहरादून से मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण प्राप्त किया।

वर्ष 2012 में मैंने अपने घर में सौ बैग से काम शुरू किया। मेहनत के बल पर जल्द ही मेरे काम ने रफ्तार पकड़ ली। लेकिन अगले ही साल प्रदेश में भीषण आपदा आ गई। इस दुख की घड़ी में मैंने चमोली गढ़वाल में अपने गांव जाकर महिलाओं को मशरूम का प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वावलंबी बनाने की ओर हाथ बढ़ाया।

इसके लिए मैंने गांव में खाली पड़े खंडहरों और मकानों में ही मशरूम उत्पादन शुरू किया। इसके अलावा कर्णप्रयाग, चमोली, रुद्रप्रयाग, यमुना घाटी के विभिन्न गांवों की महिलाओं को इस काम से जोड़ा। मैंने न सिर्फ उत्पादन पर ध्यान दिया, बल्कि इसके अलावा मार्केटिंग पर भी उतना ही ध्यान दिया।
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10 जिलों में मशरूम उत्पादन की 53 यूनिट

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खेती और उत्पादन - फोटो : फाइल फोटो
मेरा घर ही मशरूम उत्पादन की प्रयोगशाला है। मैं सीखने वालों के लिए किसी संस्थान सरीखे अपने घर में उनको न सिर्फ प्रेक्टिकल ज्ञान देती हूं, बल्कि थ्योरी भी समझाती हूं। मेरा सफर आज एक फूड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की शक्ल ले चुका है, जिसका सालाना लाखों रुपये का टर्नओवर है। मैं अब तक उत्तराखंड के 10 जिलों में मशरूम उत्पादन की 53 यूनिट लगा चुकी हूं, जिससे हजारों लोग जुड़े हैं। मुझे खुशी होती है कि मेरी कंपनी में काम करने वाले महिला और युवाओं को अपने घर में ही रोजगार मुहैया हुआ है। उनकी जिंदगी में साफ तौर पर सुखद बदलाव देखा जा सकता हैं।

मुझे अपने काम से लोगों को जोड़ने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ा। मैंने अपने काम की सफलता से उनके सामने उदाहरण प्रस्तुत किया, जिस वजह से लोग खुद-ब-खुद मुझसे जुड़ते चले गए। मेरे काम को उत्तराखंड सरकार ने भी सराहा है। इसके अलावा मुझे राष्ट्रपति पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। इन सब के बावजूद मैं अपनी जड़ों से जुड़ी हूं। सड़क पर खुद खड़ी होकर मशरूम बेचना हो या मशरूम के लिए खाद तैयार करने के लिए भूसे के ढेर में उतरना, मैं ये सारे काम खुद करती हूं।

इसके अलावा मैं सप्ताह में एक दिन अपनी गाड़ी में मशरूम की ट्रे रखकर शहर के अलग-अलग इलाकों में रोड शो कर लोगों को मशरूम के बारे में बताती हूं। मैं मानती हूं कि इच्छाशक्ति हो, तो हम घर बैठे स्वरोजगार से अच्छी-खासी कमाई कर सकते हैं। मेरा काम तो एक बेहतर शुरुआत भर है। मेरा सपना उत्तराखंड को 'मशरूम स्टेट' बनाना है।
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