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Ujjain Mayor Election: कांग्रेस से विधायक परमार का नाम लगभग तय, भाजपा में जारी है खींचतान, मंत्री यादव की पसंद रहेगी अहम

Wed, 08 Jun 2022 01:49 PM IST
चंद्रप्रकाश शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन

सार

नगर निगम चुनाव में उज्जैन महापौर के लिए प्रत्याशी चयन भाजपा के लिए सिरदर्द बन गया है। कांग्रेस ने तो विधायक महेश परमार का नाम लगभग तय कर दिया है लेकिन भाजपा में स्थिति उलझी हुई है। यहां मंत्री मोहन यादव की भूमिका खास रहेगी। 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया
नगर निगम चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है और राजनीतिक दल तैयारी में जुट गए हैं। दावेदार भी जोर-शोर से दावेदारी जता रहे हैं। अब सबसे अहम फैक्टर उम्मीदवारी है। इस मामले में कांग्रेस, भाजपा से आगे निकल गई है और तराना विधायक महेश परमार को लगभग उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। भाजपा में खींचतान चल रही है और किसी एक नाम पर पार्टी एकराय नहीं बना पा रही है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

दरअसल उज्जैन नगर निगम में महापौर का पद अजा के लिए आरक्षित है। यहां महापौर एवं पार्षदों के चुनाव 6 जुलाई को होंगे। परिणाम 17 जुलाई को घोषित होंगे। उज्जैन नगर निगम में वर्तमान में 54 वार्ड हैं, जहां से 54 पार्षद चुनकर निगम पहुंचेंगे। ये सदन में अध्यक्ष का चुनाव करेंगे। 11 जून से नामांकन की प्रक्रिया शुरू होगी जो 18 जून तक चलेगी। 22 जून तक नामवापसी हो सकेगी।  नगर निगम चुनाव में  4 लाख 61,103 मतदाता नगर सरकार चुनेंगे। इनमें महिला मतदाता 2 लाख 30177, पुरुष मतदाता 2 लाख 30879 और थर्ड जेंडर मतदाताओं की संख्या 47 है।  25 अप्रैल को प्रकाशित फोटोयुक्त अंतिम मतदाता सूची के अनुसार 18-19 वर्ष की आयु वाले 4316 युवाओं ने पहली बार वोटिंग का अधिकार पाया है। उज्जैन नगर निगम क्षेत्र के 54 में से 30 वार्डों में महिला मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। महापौर का पद उज्जैन में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। महिला और पुरुष दोनों में से कोई भी चुनाव में अपनी किस्मत आजमा सकते हैं।  6 जुलाई को सुबह 7 से शाम 5 बजे तक 568 मतदान केंद्रों पर मतदान होगा। मतगणना और चुनाव परिणामों की घोषणा 17 जुलाई को होगी। 
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महेऱ परमार विधायक तराना - फोटो : सोशल मीडिया

उम्मीदवारी की बात करें तो कांग्रेस ने बाजी मार ली है। कांग्रेस ने तराना के विधायक महेश परमार के नाम पर लगभग मुहर लगा दी है और कहा जा रहा है कि नगर निगम चुनाव में परमार ही कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे। परमार युवा चेहरा है और जिपं अध्यक्ष भी रह चुके हैं। हालांकि स्थानीय उम्मीदवार न होने को लेकर  विरोध के स्वर उठे हैं लेकिन कांग्रेस इस बार पूरी ताकत से मैदान में उतरेगी लिहाजा विरोध करने वालों को भी सख्त लहजे में समझाइश दी गई है कि टिकट जिसे भी मिले उसके लिए पूरी ताकत से काम करें। बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेता चेतन यादव ने एक बैठक में कहा था कि महापौर उम्मीदवार स्थानीय होना चाहिए। बैरवा समाज के व्यक्ति को टिकट देने पर जीत की उम्मीद ज्यादा रहेगी। स्थानीय प्रत्याशी को हम भी सपोर्ट करेंगे। चेतन यादव पूर्व पार्षद हैं। हालांकि जब पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा उज्जैन गए थे तब उन्होंने संकेत दे दिए थे कि तराना विधायक महेश परमार को चुनाव लड़ाया ज ासकता है। जिस तरह से इंदौर में विधायक संजय शुक्ला का नाम कांग्रेस ने महापौर उम्मीदवार के लिए तय किया है उसी तरह से उज्जैन में तराना विधायक महेश परमार का नाम लगभग तयकी स्थिति में है। इधर बैरवा समाज के पूर्व पार्षद व नेता प्रतिपक्ष रहे जितेंद्र तिलकर का नाम भी सामने आया है मगर उनकी दावेदारी उम्मीदवारी में बदलने पर संशय है। 

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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : सोशल मीडिया

सबसे ज्यादा खींचतान भाजपा में है। उज्जैन सीट बैरवा समाज बाहुल्य है और अभी तक के रूझान भी यही है कि बैरवा समाज के व्यक्ति को टिकट दिए जाने पर उसने जीत हासिल की है। इसके चलते भाजपा का फोकस भी बैरवा समाज के व्यक्ति को टिकट देना है। वैसे तो कई नाम चर्चाओं में हैं मगर प्रमुख रूप से डॉ. प्रभुलाल जाटवा, रामचंद्र कोरट, कमल बैरवा और जयप्रकाश जूनवाल के नाम प्रबल दावेदारों में है। रामचंद्र कोरट वाल्मिकी समाज से हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं और कई राष्ट्रीय पदों पर संगठन में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उन्हें भाजपा के वरिष्ठ विधायक तथा पूर्व मंत्री पारस जैन का करीबी माना जाता है। इसलिए उनका नाम चर्चाओं में है। डॉ. प्रभुलाल जाटवा बैरवा समाज से हैं और मंत्री मोहन यादव के करीबी हैं। मदनलाल ललावत का नाम भी चर्चा में है और वे एक बार उज्जैन के महापौर रह चुके हैं। वे बैरवा समाज से ही है और सरल सहज रूप से जाने जाते हैं।  भाजपा में महामंत्री सुरेश गिरी का नाम भी चर्चा में है। वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनरायण जटिया के पुत्र राजकुमार जटिया के नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा एक अन्य नाम कमल बैरवा का है जिनकी दावेदारी प्रबल मानी जा रही है। कमल बैरवा युवा नाम है जो संघ से जुड़ा है। उच्च शिक्षित होने के साथ ही वे 20 साल से भाजपा के सक्रिय सदस्य हैं। पूर्व में कमल वाहिनी के सह संयोजक रह चुके हैं। भाजयुमो में मंडल अध्यक्ष रहे हैं। पार्षद रह चुके हैं। संघ से द्वितीय वर्ष प्रशिक्षित है। यदि भाजपा युवा चेहरे को मौका देती है और संघ को तरजीह दी जाती है तो कमल बैरवा का नाम सबसे आगे रहेगा। डॉ.जाटवा और कोरट की उम्र अधिक है। ऐसे में यदि उम्र की गाइडलाइन आई तो दोनों को निराशा होगी। एक नाम जयप्रकाश जूनवाल का भी है जो पूर्व पार्षद हैं और संभागीय मीडिया प्रभारी रह चुके हैं। 
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मोहन यादव मंत्री मप्र शासन - फोटो : सोशल मीडिया

उज्जैन की बात करें तो नगर निगम को भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है। यहां तीन बार भाजपा और एक बार कांग्रेस का महापौर रहा है। इसके पहले जब पार्षद महापौर चुनते थे तब कांग्रेस की इंदिरा त्रिवेदी और भाजपा की अंजू भार्गव को आधा-आधा कार्यकाल मिला था। साल 2000 से उज्जैन में महापौर पद की सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है। वर्ष 2000 में निकाय चुनाव में प्रत्यक्ष प्रणाली से महापौर चुनाव हुए और जनता ने भाजपा के मदनलाल ललावत को महापौर चुना। इसके बाद हुए चुनाव में सोनी मेहर, रामेश्वर अखंड और मीना जोनवाल को महापौर चुना। बैरवा समाज के वोट की ताकत इसी से समझी जा सकती है कि जब जब बैरवा समाज को टिकट मिला उसने बाजी मारी। 2000 में कांग्रेस ने गैर बैरवा सत्यनारायण पवार को टिकट दिया, जिनके सामने बैरवा समाज से भाजपा के मदनलाल खड़े हुए और जीते। इसी तरह 2005 में कांग्रेस ने बैरवा समाज से सोनी मेहर को टिकट दिया तो उन्होंने भाजपा की सुमित्रा को हराया। चूंकि यहां बैरवा समाज के वोट 50 हजार से ज्यादा है इसलिए चुनाव में बैरवा समाज के व्यक्ति को टिकट देने वाला दल को फायदा मिला है। 

मंत्री मोहन यादव की भूमिका रहेगी अहम 
टिकट की बात करें तो भाजपा की ओर से यही कहा जा रहा है कि संभावित तीन नामों की पैनल बनाकर भोपाल भेजी जाएगी और वहीं से अंतिम मुहर लगेगी। लेकिन सूत्रों का कहना है कि उज्जैन के टिकट में मंत्री मोहन यादव की भूमिका अहम रहेगी। उन्हीं के इर्द-गिर्द उज्जैन की भाजपा की राजनीति घूम रही है, ऐसे में उनकी पसंद के चेहरे को तरजीह दी जाएगी। पूर्व कैबिनेट मंत्री पारस जैन भी दम लगा रहे हैं लेकिन सत्ता और संगठन में जिस तरह से मंत्री यादव का दखल है उसे देखते हुए यादव की पसंद को अहम माना जा रहा है। 
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