मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर के पचमठा में 11 सौ साल पुराना मां लक्ष्मी का मंदिर स्थित है। यहां दीवाली के दिन विशेष अनुष्ठान होते हैं और 24 घंटे मंदिर के पट खुले रहते हैं। यह मंदिर तंत्र साधना का एक बेहद प्राचीन केंद्र रहा है, ऐसी मान्यता है कि मंदिर में स्थित मां लक्ष्मी की प्रतिमा दिन में तीन बार अलग-अलग रूपों में भक्तों को दर्शन देती हैं। मुगलकाल में औरंगजेब ने इस मंदिर को नष्ट करने की कोशिश की थी, जिसके साक्ष्य आज भी मंदिर में मौजूद हैं। हालांकि मां लक्ष्मी की मूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है। सूर्य की पहली किरण मंदिर में मां लक्ष्मी के चरणों में पड़ती है। कहा जाता है कि इस मंदिर के नीचे खजाना गड़ा है, जिसकी रक्षा जहरीले सर्प करते हैं। शुक्रवार को मंदिर में पूजा अर्चना करने का विशेष महत्व है।
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ग्रह-नक्षत्रों पर आधारित है मंदिर
मां लक्ष्मी के मंदिर में पांच गुबंद बने हैं, जिसके चलते इस मंदिर को पचमठा मंदिर कहा जाता है। वर्गाकार मंदिर अधिष्ठान पर निर्मित है। इसके चारों दिशाओं में अर्धमंडप है। गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा पथ बना है। दीवारों पर बने आलों में योगनियां बनी हैं। मंदिर का द्वार अत्यंत अलंकृत है। सबसे नीचे योगी और उसके दोनों ओर सिंह की आकृतियां हैं। द्वार के एक ओर अनुचर और भक्तों के साथ गंगा और दूसरी ओर यमुना का अंकन है, जो गजपीठ पर खड़ी हैं। उसके ऊपर चार द्वार शाखाओं से प्रथम और अंतिम पर पुष्पवल्लरी, बीच में दोनों शाखाओं पर विभिन्न मुद्राओं में भक्त और युगल की आकृतियां बनी हैं। इसे नीचे से भारवाहक साधे हुए हैं। ललाटबिम्ब पर महालक्ष्मी, मालाधारी गंधर्व, नवग्रह, गजव्याल आदि बने हैं। सबसे ऊपर हनुमान, सरस्वती, गणपति, योगी और युगल आदि की आकृतियां बनी हैं। इस मंदिर की यह विशिष्टता और बनावट जबलपुर के किसी और मंदिर में नहीं दिखाई देती है।