शाम के सजा सराफा बाजार।
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ये हैं सराफा की परंपरागत मिठाइयां
अब यह मांग की जा रही है कि परंपरागत मिठाई की दुकानें ही सराफा में रहने दी जाएं, ऐसे में जानना जरूरी है कि आखिर वे कौन सी मिठाइयां हैं, जो प्राचीन दौर में सराफे में उपलब्ध होती थीं? सराफे और मोरसली गली में मिठाई की दुकानों पर मावे की बर्फी, मक्खन बड़े, घेवर, फैनी, मावा मिश्री के लड्डू और बेसन के लड्डू मुख्य रूप से मिलते थे। बाद में कलाकंद, रबड़ी, भुट्टे का किस, छोले टिकिया और मौसम के अनुसार गाजर का हलवा, मूंग का हलवा, तले हुए गराडू और शुद्ध घी की बड़ी जलेबी, केसरिया दूध मिलना आरंभ हुआ था। डिब्बे का आइसक्रीम गर्मी में 1950 के करीब मिलना शुरू हुआ था। गर्मी में आइसक्रीम मिलने की मुख्य वजह नगर में एसपी एंड कंपनी का पक्का बर्फ सरलता से मिलना था। वर्तमान में सराफा चाट चौपाटी पर कई दुकानें लगती हैं, जिनका मालवा के मूल व्यंजनों के कोई वास्ता नहीं है।
जमीन पर बैठाकर भोजन कराते थे
सराफा के समीप मोरसली गली में रहने वाले 70 वर्षीय अनिल गेहलोत का कहना है कि 1960 के करीब तक हमारा परिवार मोरसली गली में रहता था। गली में बड़ी संख्या में भोजन की दुकानें थीं, जिनमें जमीन पर बैठकर भोजन करवाया जाता था। जती जी की सब्जी पूरी और मांगीलाल जी का मूंग का हलवा हमने खूब खाया। वहीं, दिलीप तंवर का परिवार करीब 150 वर्ष से भी अधिक समय तक धान गली में रह रहा था। उनका कहना है कि सराफा में चुनिंदा दुकानें लगा करती थीं। 1975 के करीब मैंने 15-20 दुकानें ही देखी हैं। बाद में ये संख्या बढ़ती चली गई। 90 वर्षीय रतनलाल तंवर का कहना है कि पहले तो घर के बाहर कुछ खाने का चलन नहीं था। बाद में बाजारों में खाना आरंभ हुआ। मैं भी 1945 के बाद सराफा की चाट चौपाटी पर जाता था चुनिंदा दुकाने थीं। इनमें नागौरी की मिठाई, जोशी का दहीबड़ा, बड़ी जलेबी, ब्रजवासी और शर्मा स्वीट की मिठाई, विजय चाट का पेटिस और मित्तल की कचौरी की दुकानें प्रसिद्ध थीं।