गोविंद सिंह की सीट को भेदना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है।
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1967 में जनसंघ जीती
1967 में लहार से जनसंघ विजय रही थी। इसके बाद 1985 से 2018 तक भाजपा विजय का स्वाद नहीं चख पाई। एक संयोग है कि गोविंद सिंह ने 1990 में जनता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ा और विजयी रहे बाद में वे कांग्रेस में आ गए और कांग्रेस के टिकट पर लगातार विजय होते रहे है। 2008 और 2013 में क्षेत्र के भाजपा नेता और ट्रांसपोर्टर अंबरीश शर्मा गुड्डू भैया को भाजपा ने टिकट नहीं दिया। उनका भाजपा से मोह भंग हो गया और वे बसपा में शामिल हो गए, वर्ष 2018 में बसपा के टिकट पर वे चुनाव लड़े और 31,367 मत प्राप्त किए जो डाले गए वैध मत का 20.26 था और वे तीसरे स्थान पर रहे। वहीं, भाजपा दूसरे स्थान पर रही।
कांग्रेस का गढ़ रहा है लहार
लहार शुरू से कांग्रेस का गढ़ रहा है इसे भाजपा को भेदना एक चुनौती है। लहार 1957 एवं 1962 में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहा, हालांकि, 1967 से सामान्य सीट में तब्दील हो गया। इस साल जून माह में अंबरीश शर्मा बसपा छोड़ पुनः भाजपा में शामिल हो गए। वहीं, गोविंदसिंह जद से कांग्रेस में आ गए और चुनाव लड़े और आज तक विजय हो रहे हैं। अब अंबरीश शर्मा गुड्डू भैया ने यही किया क्या शर्मा इतिहास दोहराएंगे? यह तो वक्त ही बताएगा, चुनाव में दोनों महारथी मैदान में हैं। देखना है मतदाता किसे चुनते हैं।
लहार सीट की रोचक जानकारी
- 33 साल से गोविंद सिंह लहार सीट पर काबिज हैं।
- पंडोखर सरकार ने अपने दिव्य दरबार में गोविंद सिंह को विजय का आशीर्वाद दिया है।
- 1957 में सर्वाधिक मतदान 85. 1 प्रतिशत एक रिकॉर्ड है। न्यूनतम मतदान वर्ष 1962 में 42.5 रहा था।
- वर्ष 2013 में लहार से 31 उम्मीदवार चुनाव मैदान में अपना भाग्य आजमा रहे थे। जो एक रिकॉर्ड था।