बंगाली समाज का दुर्गा उत्सव पांच दिवसीय रहता है
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1918 में मना पहला दुर्गा उत्सव
बंगाली परिवारों का धीरे-धीरे नगर में आगमन होता गया और इन्हीं परिवारों द्वारा इंदौर में 1918 में अपने क्षेत्र में नवदुर्गा उत्सव मनाया जाने लगा। यह उत्सवी परंपरा बंगाली क्लब के बैनर तले 1928 में सार्वजनिक रूप से शुरू हुई। तब तक नगर में 125 से अधिक बंगाली परिवार आ गए थे। इन्हीं परिवारों ने सार्वजनिक रूप से शारदीय नवरात्र उत्सव मनाना आरंभ किया। इसके प्रेरणा स्रोत थे, गोपाल चंद्र मुखर्जी, जेएन बनर्जी, भूपेंद्रनाथ बसु और हेमचंद्र डे।
अन्य समाज का भी सहयोग रहा
शुरुआती दिनों में बंगाली समाज की नगर में विशेष पहचान नहीं थी। इस उत्सवी परंपरा को सार्वजानिक रूप से मनाए जाने के कारण गैर बंगाली लोगों को भी सम्मिलित किया गया। जो नगर के बहुत ही प्रतिष्ठित लोग थे। इनमें प्रमुख नाम पंडित मुकुंदराम भवानी शंकर त्रिवेदी, सेठ मोतीलाल, पंडित ख्यालीराम द्विवेदी, कैप्टन कृष्णलाल, पंडित रामचंद्र शर्मा और शंभूनाथ त्रिपाठी प्रमुख थे।
कहां आयोजित हुआ था पहला कार्यक्रम
1928 से सार्वजनिक नवदुर्गा उत्सव समिति का कार्यक्रम आयोजित होने के बाद इसे किसी अन्य स्थान पर भव्य रूप से आयोजित करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए वर्तमान में सरवटे बस स्टैंड के सामने स्थित सेठ टीकमचंद मूलचंद की धर्मशाला वाले स्थान पर पहला कार्यक्रम आयोजित किया गया था। उस समय धर्मशाला निर्मित नहीं थी और खुला मैदान था।