हवाईन गिटार से प्रवाहित सुरों ने परंपरा और नवाचार का अद्भुत संगम रच दिया।
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इसके पश्चात मंच पर पंडित सुनील पावगी (ग्वालियर)—हवाईन गिटार जैसे दुर्लभ पाश्चात्य वाद्य पर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विशिष्ट साधना करने वाले प्रतिष्ठित कलाकार उपस्थित हुए। ग्वालियर एवं आगरा घराने की समृद्ध परंपरा से जुड़े पंडित पावगी ने राग बिलासखानी तोड़ी को अत्यंत भावपूर्ण और सघन अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया। गंभीर आलाप से आरंभ कर जोड़ और झाला के माध्यम से राग का क्रमिक विकास किया, जिससे राग की करुणा और सौंदर्य गहराई से अनुभूत हुआ। झपताल और तीनताल में प्रस्तुत सधी हुई गतों ने उनकी तकनीकी दक्षता और रचनात्मक कल्पना को उजागर किया। हवाईन गिटार से प्रवाहित सुरों ने परंपरा और नवाचार का अद्भुत संगम रच दिया। अंत में राग बसंत मुखारी की धुन के साथ उन्होंने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति को विराम दिया। तबले पर उस्ताद सलीम अल्लाहवाले तथा सह वादन में हवाईन गिटार पर साहेब सिंह ने संगत की।
प्रातःकालीन सभा की अंतिम प्रस्तुति प्रसिद्ध सारंगी वादक घनश्याम सिसौदिया (दिल्ली) की रही। मध्यप्रदेश की माटी में जन्मे और ग्वालियर घराने की परंपरा से जुड़े सिसौदिया ने अपने सारंगी वादन से श्रोताओं को भावनाओं के सूक्ष्म संसार में प्रवेश कराया। तानसेन समारोह जैसे ऐतिहासिक मंच पर प्रस्तुति देते हुए उन्होंने राग मधुवंती को करुणा, मधुरता और गहन संवेदनशीलता के साथ साधा। सारंगी से निकलते मर्मस्पर्शी सुरों ने वातावरण को रसात्मक बना दिया। ताल अष्टमंगल में विस्तृत आलाप और उसके पश्चात द्रुत तीनताल की बंदिशों ने उनकी लयकारी और वादन कौशल का प्रभावशाली परिचय दिया। प्रस्तुति का समापन राग मिश्र भैरवी से हुआ। तबले पर बलराम सिसौदिया तथा सह सारंगी वादन में उनके पुत्र कृष्णा सिसौदिया ने संगत कर प्रस्तुति को और भी सशक्त बनाया।
इस प्रकार सुरों की साधना, परंपरा की गरिमा और भावनात्मक अभिव्यक्ति से सजी यह प्रातःकालीन संगीत सभा श्रोताओं के लिए एक अविस्मरणीय, आध्यात्मिक और रसपूर्ण अनुभव बनकर स्मृतियों में अंकित हो गई।