जिंदगी कभी-कभी इंसान से सब कुछ छीन लेती है—घर, पहचान, अपनों की आवाज और यहां तक कि मातृभूमि की मिट्टी भी। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के खैरलांजी गांव के प्रसन्नजीत रंगारी की कहानी कुछ ऐसी ही दर्दनाक है। बीते सात वर्षों तक वह पाकिस्तान की जेल में “सुनील अदे” बनकर कैद रहा। लेकिन 31 जनवरी 2026 को जब पाकिस्तान ने सात भारतीय कैदियों को रिहा किया, तो उनमें प्रसन्नजीत का नाम भी शामिल था। इस खबर ने बालाघाट के एक साधारण से घर में खुशी और आंसुओं का सैलाब ला दिया।
1 फरवरी की दोपहर करीब एक बजे खैरलांजी थाने से फोन आया—“आपका भाई पाकिस्तान से रिहा हो गया है।” यह सुनते ही बहन संघमित्रा फूट-फूट कर रो पड़ीं। ये आंसू दर्द के नहीं, बल्कि सात साल के इंतजार के बाद मिली खुशी के थे। जब बहन ने भाई की आवाज सुनी, तो पहचान की डोर मानो पहले ही टूट चुकी थी। प्रसन्नजीत ने कहा—“मेरे पास टिकट नहीं है, तुम ही मुझे लेने आ जाओ।” यह सुनकर संघमित्रा का दिल भर आया।
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