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होली के 5 दिनों बाद रंगपंचमी पर इंदौर में ऐसे उड़ा रंग

Wed, 07 Mar 2018 03:57 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
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होली के रंग में तो पूरा देश रंगता है लेकिन रंगपंचमी का रंग तो मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात में चढ़ता है। इसमें भी मध्य प्रदेश के इंदौर में जो रंग खिलता है वह नजारा और कहीं नहीं देखने को मिलता। होली के ठीक पांच दिनों बाद मनाए जाने वाली रंग पंचमी मंगलवार को बहुत धूमधाम से मनाई गई। 
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रंग पंचमी होली का आखिरी पर्व होता है क्योंकि होली करीब एक महीन पहले से ही अलग-अलग ढ़ंग से देश के कई हिस्सों में मनाई जाती है। यह पर्व चैत्र मास की कृष्ण पंचमी को मनाया जाता है। रंगपंचमी पर निकली वाली गैरें सबसे खास होती है। इसे फाग यात्रा भी कहा जाता है। 
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एमपी की राजधानी भोपाल और कई शहरों समेत इंदौर में भी गैरें निकाली गई। हर कोई एक दूसरे को रंग से सराबोर करने की होड़ में दिखा। लोग गीत और संगीत की धुनों पर थिरकते रहे। रंगपंचमी पर सूरज के सिर पर आते ही ये रंगारंग जुलूस शहर के अलग-अलग हिस्सों से गुजरते हुए ऐतिहासिक राजबाड़ा के सामने पहुंचते हैं, जहां रंग-गुलाल की चौतरफा बौछारों के बीच हजारों हुरियारों का आनंद में डूबा समूह कमाल का मंजर पेश करता है। 

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रंग पंचमी मनाने के पीछे आध्यात्मिक मान्यता है। दरअसल उडते हुए रंग और गुलाल सात्विक गुणों को बढ़ाते हैं और व्यक्ति के अगुणों का नाश होता है। रंग पंचमी मानने के पीछे मान्यता है कि इस दिन जब रंगों को जब एक दूसरे को लगाया जाता है और गुलाल को हवा में उड़ाया जाता है तो इस दिन देवी-देवता आकर्षित होते हैं। ऐसी मान्यता है कि रंग पंचमी के दिन रंग के संग खेली जाने वाली रंगपंचमी बुरी शक्तियों की समाप्ति का प्रतीक है।
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बैंड-बाजों की धुन पर नाचते हुरियारों पर बड़े-बड़े टैंकरों से रंगीन पानी बरसाया जाता है। यह पानी टैंकरों में लगी ताकतवर मोटरों से बड़ी दूर तक फुहारों के रूप में बरसता है और लोगों के तन-मन को तर-बतर कर देता है। खास बात यह है कि गेर में कोई भी व्यक्ति एक-दूसरे को रंग नहीं लगाता। फिर भी हजारों हुरियारे एक रंग में रंग जाते हैं और अपने-पराये का भेद मिटता-सा लगता है।
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इंदौर में गैरें की परंपरा रियासत काल में शुरू हुई, जब होलकर राजवंश के लोग रंगपंचमी पर आम जनता के साथ होली खेलने के लिए सड़कों पर निकलते थे। ऐसा माना जाता है कि इस परंपरा का एक मकसद समाज के हर तबके के लोगों को रंगों के त्योहार की सामूहिक मस्ती में डूबने का मौका मुहैया कराना था। राजे-रजवाड़ों का शासन खत्म होने के बावजूद इंदौर के लोगों ने इस रंगीन रिवायत को अब तक अपने सीने से लगा रखा है। वक्त के तमाम बदलावों के बाद भी रंगपंचमी पर शहर में रंगारंग परेड रूपी गैरें का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
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