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यूथ आइकॉनः खुद पर जो बीती, किसी और पर नहीं बीतने दूंगी

Thu, 12 Dec 2019 04:13 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
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अपूर्वा व आस्था - फोटो : अमर उजाला
उनके साथ रहो, जिनका वक्त खराब है। उनका साथ छोड़ दो, जिनकी नियत खराब है। इसी सोच के साथ वकालत के पेशे को अपनाया और जरूरतमंदों की मदद में जुटे हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो कॉरपोरेट कल्चर की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं। वे सर्विस की बेहतर क्वालिटी को अपनी खासियत मानते हैं। उनके लिए वकालत एक ऐसा पेशा है, जिसमें कॅरिअर की राह बहुत आसान है, बस नियम और कानून की समझ और सम्मान करना आना चाहिए। आइए जानते हैं ऐसे ही यूथ आइकॉन के बारे में...।

 
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चरण डी.एस. बेदी - फोटो : अमर उजाला
बेहतर भारत के लिए सभी को पढ़ना चाहिए कानून
- चरण डी. एस बेदी

कॉमर्शियल पायलट के रूप में कॅरिअर शुरू किया। मम्मी नहीं चाहती थीं कि मैं इस कॅरिअर को आगे जारी रखूं। उन्हीं की इच्छा का सम्मान करते हुए मैंने एलएलबी किया और वकील बन गया। इस वक्त हमारी सीके लीगल नाम से एक फर्म है। इसके माध्यम से हम बैंकों के लीगल मामलों को देखते हैं। इसके अलावा जनहित याचिकाओं पर भी काम करते हैं। मैंने इस कॅरिअर को दो कारणों से चुना। एक मां की इच्छा थी, दूसरा हमारे जीवन का हर पल कहीं न कहीं नियम-कानून के दायरे से बंधा है। देश के हर नागरिक को कानून का पालन करना जरूरी है। न्यायालय में याचिकाओं की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में वकील या कहिए कि किसी न किसी मध्यस्थ की जरूरत बढ़ती जा रही है। हर क्षेत्र में लॉ स्पेशलिस्ट की जरूरत हमेशा रहेगी। यदि भारत का हर व्यक्ति अपनी नियमित शिक्षा के साथ एक साल की कानूनी पढ़ाई कर ले तो हम एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकेंगे। लॉ एक साधारण क्षेत्र है, कहीं कोई चुनौती नहीं है, बस कानून की समझ और विजन साफ होना जरूरी है।
हमारी खासियत : हम गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते, क्लाइंट को तय समय सीमा में उनकी समस्या का समाधान करके देना हमारी खासियत है। चक्कर कटवाने में हमारा यकीन नहीं।
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विवेक कुमार सिंह - फोटो : अमर उजाला
विश्वास का संकट दूर करने की जद्दोजहद
- विवेक कुमार सिंह

बीकॉम करने के बाद एसबीआई में पीओ पद पर चयन हो गया। नौकरी समझ नहीं आई। पापा के साथ चाय पर चर्चा के दौरान अचानक तय कर लिया और एलएलबी की तैयारी शुरू कर दी। वर्तमान में हाईकोर्ट में कॉरपोरेट व लेबर लॉ के मामले देख रहा हूं। हालांकि मुझे अभी सिर्फ 3.5 साल का ही अनुभव है, लेकिन इस थोड़े से वक्त में समझ आया कि वकीलों के सामने विश्वास का बड़ा संकट है और यही इस पेशे की चुनौती भी है। दरअसल लीगल मार्केट खड़ा हो गया है और इसके कारण यह व्यवसाय भी पूरी तरह से बाजार आधारित होता जा रहा है, लगभग हो ही गया है। जबकि एक बड़ा वर्ग ऐसा है, खासकर भारत में जिसे निशुल्क या कहें कि सस्ती कानूनी सहायता भी चाहिए। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए मैंने डिफेंस में इंटरेस्ट लेना शुरू किया है। मैंने तय किया है कि सैन्य पृष्ठभूमि वालों के केस मैं निशुल्क लड़ूंगा।
मेरा सपना : मेरे आदर्श मेरे पिता मदन नारायण सिंह हैं। मेरा सपना है कि मैं एक ऐसे वकील के रूप में पहचान बना सकूं, जिसके पास वह हर जरूरतमंद आ सके, जिसे कहीं और मदद नहीं मिल पाती है।

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अपूर्वा श्रीवास्तव - फोटो : अमर उजाला
लड़कियों की क्षमता को साबित करना है
- अपूर्वा श्रीवास्तव

कॅरिअर के बारे में जब तय कर रही थी, तब एक ही पेशा आंखों के सामने था, वो है वकालत। दरअसल मुझे यह लगता था कि लड़कियां इस क्षेत्र में कम आतीं हैं। शायद इस पेशे की चुनौतियों के कारण ही मुझे लगा कि मुझे खुद को नहीं बल्कि लड़कियों की क्षमताओं को साबित करना था। हालांकि यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन लड़ाई घर से ही शुरू हो गई थी। हालांकि धीरे-धीरे पापा-मम्मी सभी ने विश्वास कर लिया। मैं शुरुआती दिनों से ही आली संस्था से जुड़ गई। दस साल के करीब हो गए मुझे इस क्षेत्र में। महिला हिंसा से जुड़े मुद्दों पर हमारी लड़ाई है और हमारे लिए हर पीड़ित महिला की मदद करना हम अपनी जिम्मेदारी समझते हैं।
 मेरा नजरिया : वकालत एक ऐसा पेशा है जो आपको सशक्त बनाता है। युवा वकीलों को यह समझना होगा कि हमें कानून के दायरे से बाहर नहीं जाना। जरूरतमंदों की हर संभव मदद करना है।
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आस्था मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
खुद पर जो बीती, किसी और पर नहीं बीतने दूंगी
- आस्था मिश्रा

मेरी शादी हो चुकी थी, नहीं मालूम था कि मुझे एक दिन तलाक लेना पड़ेगा। मानसिक प्रताड़ना ने मुझे तोड़ा पर मेरा हौसला आज मेरे साथ है। एक लीगल फर्म से जुड़ी हूं। इस पेशे को इसलिए चुना क्योंकि इस क्षेत्र को पुरुष प्रधान माना जाता है। मैं किसी को चुनौती नहीं देना चाहती, लेकिन मुझे लगा कि मैं इस व्यवसाय की चुनौतियों को स्वीकार कर सकती हूं। इसके पीछे एक और कारण है कि महिलाएं अपने कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हैं। वे ये नहीं जानती कि उन्हें कहां विरोध करने का हक है। मैं उन तक इस जागरूकता को अपनी कोशिशों से पहचाना चाहती हूं। जिस फर्म से जुड़ी हूं फिलहाल वहां कंपनियों के मामले देखे जाते हैं।
 मेरी कोशिश : मैं घरेलू हिंसा या किसी भी तरह की हिंसा की शिकार महिलाओं को कानूनी मदद देकर उन्हें न्याय दिलाना चाहती हूं।
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