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Women's Day स्पेशल: जानें, उन महिलाओं को जिन्होंने लखनऊ को दी नई पहचान

Wed, 08 Mar 2017 09:37 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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जानिए उन महिलाओं को जो अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हैं... लखनऊ की नई पहचान हैं... भविष्य के सुनहरे सपने बुन रही हैं... बेटी, बहन, पत्नी, मां... तमाम रिश्तों को जीते हुए भी खुद की पहचान गढ़ी है... वह सशक्त हैं, ताकतवर हैं, उनमें जूझने और जीतने का माद्दा है... एक सफल वास्तुकार की तरह समाज को अपने ढंग से संवार रही हैं, आकार दे रही हैं... परिवार और समाज की जिम्मेदारी के बीच संतुलन साधकर अपने जीवन की नायिका खुद बन चुकी हैं...

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर ‘अमर उजाला’ सलाम कर रहा है ऐसी ही अपराजिताओं को...
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डिम्पल यादव (सांसद)
सैन्य पृष्ठभूमि में पली-बढ़ी सांसद डिम्पल यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी और मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू हैं। कॉमर्स ग्रेजुएट डिम्पल दो बेटियों और एक बेटे की मां हैं। राजनीति में उनकी एंट्री 2009 में हुई। हालांकि फिरोजाबाद से राजबब्बर के खिलाफ वह लोकसभा चुनाव हार गई थीं। 2012 और 2014 में वह कन्नौज से सांसद चुनी गईं। डिम्पल राजनीति का सौम्य और सबसे प्रभावी चेहरा बनकर उभरी हैं। पारिवारिक कलह के बीच पति के साथ हर मोर्चे पर खड़ी नजर आईं। हाल फिलहाल वह विधानसभा चुनावों में धुआंधार प्रचार शैली के कारण चर्चा में हैं।
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बेगमा हामिदा हबीबुल्लाह (पूर्व सांसद और मंत्री, समाजसेविका)
हैदराबाद हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रहे नाजिर यार जंग बहादुर की बेटी और मेजर जनरल इनायत हबीबुल्लाह की पत्नी बेगम हामिदा महिला सशक्तीकरण का जीता-जागता उदाहरण हैं। जीवन के सौवें वसंत में भी उनकी जिंदादिली हर किसी को अपना कायल बना लेती है। सांसद और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुकीं बेगम ‘सेवा चिकनकारी’ की प्रमुख हैं। इन सबसे बढ़कर वह प्रगतिशील भारतीय मुस्लिम महिला का एक प्रभावी चेहरा हैं। उनका जीवन भारतीय महिलाओं खासकर अल्पसंख्यक महिला समुदाय को अपने तरीके से जीवन जीने और आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देता है।

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श्रुति सडोलिकर काटकर
(कुलपति, भातखंडे संगीत सम विश्वविद्यालय)
जयपुर अतरौली घराने की शास्त्रीय गायिका श्रुति खयाल स्टाइल में गाती हैं। संगीत नाटक अकादमी अवार्ड से सम्मानित श्रुति कोल्हापुर के एक प्रसिद्ध परिवार में जन्मीं है। श्रुति ने संगीत की शिक्षा घर में ही पिता पं. वामनराव सडोलिकर से ग्रहण की। इसके बाद गुलुभाई जसदनवाला और अजीज्जुद्दीन खान से संगीत की शिक्षा ली। ठुमरी, टप्पा, नाट्य संगीत जैसी अन्य विधाओं में गाने वाली श्रुति भारत के अलावा कनाडा, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी समेत तमाम देशों में मंच पर अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं। साथ ही विश्व के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाने का भी उन्हें मौका मिला।
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डॉ. मंदाकिनी प्रधान
(मैटरनल एंड रिप्रोडक्टिव हेल्थ, एसजीपीजीआई)
‘पापा के मुंह से एक दिन सुना था कि एक अच्छा डॉक्टर ही देश की सच्ची सेवा कर सकता है। बस ठान लिया कि डॉक्टर ही बनना है।’ ओडिशा से एमबीबीएस किया, चंडीगढ़ पीजीआई से एमडी और फिर मेडिकल जेनेटिक्स में डीएम किया। डॉ. प्रधान ने ही पहली बार एसजीपीजीआई में फीटस में ब्लड ट्रांसफ्यूजन शुरू किया। विश्व के सबसे छोटे भ्रूण में ब्लड ट्रांसफ्यूजन का रिकॉर्ड भी इन्हीं के नाम है। हाल ही में भ्रूण के सीने में भरे पानी को शंट डालकर निकालने की अपनी तरह की देश की पहली बेहद जटिल सर्जरी कर सुरक्षित प्रसव कराने के कारण चर्चा में रहीं।
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कानून की पुरोधा
बुलबुल गोदियाल (अतिरिक्त महाधिवक्ता)
उस दौर में शादी का मतलब कॅरिअर का अंत माना जाता था, पर बुलबुल के कॅरिअर को पंख शादी के बाद ही लगे। उन्होंने रोहतक कॉलेज में दाखिला लिया और अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री ली, फिर एलएलबी पूरा किया। इसी दौरान वे तीन बेटियों की मां बनीं और इसी के साथ कॅरिअर को रफ्तार दी। आज वे उत्तर प्रदेश की पहली महिला अधिवक्ता हैं। 1991 में वह इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में बतौर अधिवक्ता रजिस्टर्ड हुईं और अपने पिता वरिष्ठ अधिवक्ता रॉबिन मित्रा के साथ प्रैक्टिस शुरू की। बुलबुल उन सभी बेटियों के लिए एक उदाहरण हैं, जो आगे चलकर लॉ में कॅरिअर बनाने की इच्छुक हैं।
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देव्या गिरि
(महंत, मनकामेश्वर मंदिर)
बाराबंकी के एक पत्रकार की बेटी, ग्रेजुएट बेटी ने 25 साल की उम्र में संन्यास लिया। 2008 में वह मनकामेश्वर मठ मंदिर की महंत बनीं। इसके बाद शुरू हुआ विरोधों का सिलसिला। उन्होंने घोषणा कर दी कि भगवान ने ही उन्हें यह पद संभालने की जिम्मेदारी दी है। आज वह सर्वधर्म समभाव की प्रतीक बन चुकी हैं। इसके लिए राज्य सरकार ने उन्हें ‘गुरु गोविंद सिंह एकता’ पुरस्कार से भी नवाजा। समाज सेवा को सबसे बड़ा धर्म मानने वाली देव्या लुप्त हो रहे और सूख रहे जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने और गोमती जल की महिमा स्थापित करने में सक्रिय हैं।

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वंदना सहगल
(आर्किटेक्ट और पेंटर)
एक आर्किटेक्ट और एक चित्रकार के साथ-साथ वे प्रोफेसर भी हैं। हाल ही में उनकी नियुक्ति कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर की प्रिंसिपल और डीन के पद पर हुई है। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी में परमानेंट फैकल्टी डॉ. वंदना वर्कशॉप, सेमिनार और ट्रेनिंग की व्यस्तता के बीच भी पेंटिंग के लिए समय निकाल लेती हैं। खुद को पेंटर कहलाना पसंद करती हैं। वंदना ने तय कर रखा है कि साल में एक पेटिंग प्रदर्शनी जरूर लगाएंगी। वंदना फिलहाल बनारस और शिव पर चित्रों की एक सीरीज तैयार कर रही हैं, उम्मीद है कि अगस्त-सितंबर तक उनकी नई पेटिंग्स कलाप्रेमियों के सामने होंगी।
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साहित्य से समाज को दिशा
विद्या बिंदु सिंह
(विदुषी व वरिष्ठ साहित्यकार)अंबेडकरनगर के गांव जैतपुरा में जन्मीं विद्या बिंदु सिंह ने बीए तक की पढ़ाई घर पर रहकर की। उस दौर में बेटियों को बाहर भेजने का चलन नहीं था। ग्रेजुएशन करने के बाद इनकी भी शादी हो गई। पति कृष्ण प्रताप सिंह आबकारी विभाग में थे। आगरा चली गईं। एमए में एडमिशन लिया तो कॅरिअर को नई दिशा मिली। पीएचडी, डी लिट् तक यह सिलसिला चलता रहा। ससुराल से नौकरी तो नहीं की, लेकिन पढ़ाई की परमिशन थी। लेकिन पति के ट्रांसफर होते रहने से अध्यापन ज्यादा समय तक नहीं चला। फिर हिंदी संस्थान में प्रधान संपादक बनीं और संयुक्त निदेशक पद से रिटायर हुईं। अब तक 105 से अधिक किताबें छप चुकी हैं।
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