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25 साल से मर्द के भेष में खुद को क्यों छिपा रही है ये औरत, कहानी हैरान कर देगी

Wed, 01 Feb 2017 05:35 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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कमला
ये मर्दाना कपड़ों में कौन खड़ा है...यूपी के आईपीएस अफसर नवनीत सिकेरा की फेसबुक वॉल पर जब कमला की तस्वीर के साथ ये लाइनें दिखीं तो हम भी चौंक गए। कमर तक लंबे बालों को खुद अपने हाथों से काटते वक्त कमला को बेहद तकलीफ हुई थी लेकिन इसके पीछे की वजह और भी तकलीफदेह है। यहां जानें, 25 साल से ज्यादा वक्त से मर्दाना भेष में अपने अंदर की महिला को छ‌िपाने वाली कमला की कहानी...
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कमला - फोटो : amar ujala
मुजफ्फरनगर के मीरापुर दलपत इलाके में एक जाट परिवार में जन्मी कमला की शादी को कुछ ही वक्त गुजरा था कि उसके पत‌ि की मौत हो गई। कमला से उसकी बेटी छीनकर उसके ससुरालवालों ने उसे धक्के देकर निकाल दिया।
 
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कमला - फोटो : amar ujala
कमला के माता-पिता की मौत पहले ही हो चुकी थी। उसके दो सगे भाइयों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया। उसका तीसरा भाई निशक्त था लेकिन उसने कमला को अपने घर में पनाह दे दी।

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कमला - फोटो : amar ujala
कमला के भाई को कैंसर हो गया। उसके दो छोटे बच्चे थे। ‘ये बच्चे तुझे ही पालने हैं’, कहते हुए कमला का भाई भी चल बसा। भाई के आखिरी शब्द कमला के जहन में बैठ गए और कमला ने तय कर लिया कि कैसे भी करके भाई के बच्चों को जिंदा रखना है।
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कमला
कमला के पास जीने का सहारा भाई की थोड़ी-बहुत खेती थी। गांव में रात में ही लाइट आती थी लिहाजा खेत में सिर्फ मर्द पानी लगाने जाते थे। एक ‌महिला का वहां जाना किसी भी लिहाज से सुरक्षित नहीं था। आए दिन महिलाओं के साथ ‘अनहोनी’की खबरें सुनने को मिलतीं। कमला नहीं चाहती थी कि देर रात वहां मर्दों को किसी महिला की मौजूदगी का अहसास हो तो उन्होंने ऐसे निकाला रास्ता...
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कमला - फोटो : amar ujala
कमला बताती हैं, मेरे बाल कमर तक लंबे थे और मुझे अपने बालों से बहुत प्यार था। जब खेत पर पानी लगाने का फैसला लिया तो कैंची उठाई और अपने हाथों से घने, लंबे बालों को काट दिया। कमला बताते हुए भावुक हो जाती हैं, बाल काटते वक्त मुझे बेहद तकलीफ हुई थी लेकिन उस वक्त मुझे कुछ और नहीं सूझ रहा था। और इस तरह मर्दों की बुरी नजरों से खुद को बचाने के लिए कमला को मर्द का भेष बनाना पड़ा। कमला ने अपने बाल काटे, मर्दों वाले कपड़े पहने और हाथ में लट्ठ लेकर जा पहुंची खेतों में पानी लगाने।
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कमला
कमला ने वो सारे काम क‌िए जो खेत पर एक पुरुष करता है। खेतों में कड़ी मेहनत की, हल चलाया, फावड़ा चलाया, जानवारों को चारा-पानी कराने के साथ ही ट्रैक्टर चलाने तक का काम कमला ने अपने जिम्मे लिया। अगली स्लाइड में देखें, एक गलती ने  कमला को कैसे पहुंचाया स्कूल...
 

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कमला
कमला बताती हैं क‌ि एक दिन घर की सफाई के दौरान  उन्होंने अपने भाई के बेटे की पढ़ाई की जरूरी फाइलें  गलती से रद्दी समझकर फेंक दी। जब भतीजा आया तो बहुत रोया। भतीजे को परेशान देखकर कमला को बहुत दुख हुआ। उसे अहसास हुआ कि अगर वह पढ़ी‌-लिखी होती तो आज उससे इतनी बड़ी गलती न होती। इस घटना से कमला ने जीवन में पढ़ाई का महत्व सीखा और पढ़ने की ठानी। उम्र ज्यादा होने के कारण राह में मुश्किलें आईं लेकिन कस्तूरबा स्कूल में स्पेशल परमिशन लेकर आठवीं तक पढ़ाई पूरी की।
 

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कमला
कमला के दुख यहीं खत्म नहीं हुए, जीवन ने उसकी फ‌िर परीक्षा ली। वो बेटी जिसे कमला के ससुरालवालों ने उससे अलग कर दिया था, शादी के बाद वह अपनी मां से मिलने आई। बरसों बाद अपनी बेटी को देखकर कमला को बेहद खुशी हुई। बेटी अक्सर मां के हालचाल ले लेती। लेकिन एक दिन कमला से बेटी का प्यार भी छिन गया। पत‌ि के साथ किसी महिला के अनैतिक संबंध होने के चलते कमला की बेटी ने आत्महत्या कर ली। कमला आज भी अपनी बेटी को याद करके कहती है, मर्द की जात ही इधर-उधर मुंह मारने वाली होती है लेकिन किसी औरत को दूसरी औरत का घर नहीं खराब करना चाहिए।

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कमला
कमला ने जिनके लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी अब उन्हीं ने उनसे किनारा कर लिया। उसके बड़े भतीजे की शादी के बाद बहू ने झगड़ा शुरू कर दिया। वह अब गांव में ही बने जानवरों के टूटे-फूटे घर में रहती हैं। वहीं कमला को चिंता है कि जब छोटे भतीजे की शादी हो जाएगी तो उससे ये टूटा-फूटा घर भी छिन जाएगा।
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कमला
जीवनभर दुख उठाने के बावजूद, कमला आज भी औरों के ल‌िए संघर्ष कर रही हैं। वह सोशल वर्कर और 1090 के ल‌िए काम करने वाली बीना दीदी के साथ मिलकर अपने गांव की मह‌िलाओंं को जागरूक भी करती हैं। वह मह‌िलाओं को स‌िखाती हैं न हार मानें, न चुपचाप अत्याचार सहें। जीवनभर एक औरत के रूप में कष्ट सहने और मर्द के रूप में अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी गुजारने वाली कमला क्या अगले जन्म में मर्द के रूप में इस दुन‌िया में आना चाहेंगी? इस पर कमला का जवाब है, मैं चाहती हूं क‌ि अगले जन्म बेटी बनकर पैदा होऊं और औरत बनकर हर संघर्ष करूं और उसे जीतूं। (साभार: आईपीएस नवनीत स‌िकेरा, सोशल वर्कर बीना शर्मा)
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