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Wolf Attacks: हमलों से साफ है, अब तक नहीं पकड़े गए असली आदमखोर भेड़िये; साथी को बचाने के लिए दे देते हैं जान

Thu, 05 Sep 2024 02:32 PM IST
शाहरुख खान अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
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Wolf attack in Bahraich - फोटो : अमर उजाला
यूपी में विलुप्तप्राय भेड़िये इंसानी जान के लिए संकट बने हुए हैं। इनके हमले में मार्च 2024 से अब तक बहराइच में नौ बच्चों और महिला की मौत हुई है। साथ ही सीतापुर, पीलीभीत और हस्तिनापुर में भी भेड़ियों ने आतंक मचा रखा है। बड़ी मशक्कत के बाद बहराइच से चार भेड़िये पकड़े गए हैं। 

इसके बाद भी इंसान और भेड़ियों के बीच जारी संघर्ष से अंदेशा लगाना मुश्किल नहीं है कि असली हमलावर अब तक पकड़ में नहीं आए हैं। विशेषज्ञों का भी मानना है कि इंसानों को शिकार बनाने वाले असली भेड़िये अभी तक पकड़े नहीं गए हैं। लिहाजा, स्थानीय प्रशासन और वन विभाग को ज्यादा संजीदगी के साथ अभियान चलाने की जरूरत है।
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Wolf attack in Bahraich - फोटो : istock
बेहद शर्मीला जानवर है भेड़िया
बार-बार सवाल उठ रहा है कि भेड़िये आदमखोर क्यों हो रहे हैं? क्या इनकी संख्या बढ़ रही है? दुधवा टाइगर रिजर्व में फील्ड डायरेक्टर व वन्यजीव विशेषज्ञ संजय पाठक के मुत्ताबिक, भेड़िया बेहद शर्मीला जानवर है। ये इंसान को देखते इतना तेजी से भाग जाता है कि इनकी फोटोग्राफी करना भी आसान नहीं होता है। यह इंसानों की तरह झुंड में रहता है। अगर शिकार के बाद कोई एक सदस्य इधर-उधर गुम हो जाए तो बाकी सदस्य उसको खोज निकालने तक शिकार को छूते तक नहीं हैं।
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Wolf attack in Bahraich - फोटो : istock
संजय पाठक बताते हैं कि ये इंसानों पर तभी हमला करते हैं, जब बाढ़, मांद में पानी घुस आने या अन्य किसी कारण से इन्हें अपना प्राकृतिक वास छोड़ना पड़ता है और इस प्रक्रिया में कहीं उनकी जद में इंसान का कोई बच्चा आ जाता है। उसके बाद बच्चों पर हमला करने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। अगर इंसान भेड़ियों के झुंड के किसी सदस्य को मार देता है तो भी उनके अंदर बदले की भावना घर कर जाती है और वे हमला करने लगते हैं।

 

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Wolf attack in Bahraich - फोटो : istock
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि आम तौर पर देखा गया है कि झुंड का कोई एक सदस्य इंसान के बच्चे पर हमला करता है। भेड़िया जो मांस खुद खाता है, बाद में उसे उल्टी करके अपने बच्चों को खाने के लिए निकाल देता है। इस तरह से उस झुंड के सदस्यों को इंसान का मांस खाने का चस्का लग जाता है। यही आदमखोर प्रवृत्ति इंसानों के लिए खतरा बन जाती है।

 
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bahraich - फोटो : amar ujala
वन्जीव विशेषज्ञ बताते हैं कि भेड़िये इतने सामाजिक प्राणी होते हैं कि अपने सहगामी की रक्षा के लिए अपनी जान भी दे सकते हैं। कई बार लोग भेड़ियों और कुत्तों में फर्क नहीं कर पाते और कुत्तों को भी भेड़िया समझ लेते हैं। समझने की बात यह है कि आम तौर पर भेड़िये आदमखोर नहीं होते। इंसानों की आबादी के आसपास ही जंगल या खेतों में छिपकर रहते हैं।
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भेड़िया - फोटो : Freepik
कब करते हैं हमला और कैसे लगता है इंसानी मांस का चस्का
भेड़िये इंसानों पर तभी हमला करते हैं, जब बाढ़, मांद में पानी भरने या दूसरे कारण से इन्हें अपना प्राकृतिक वास छोड़ना पड़ता है। इस दौरान अगर उनकी जद में इंसान का बच्चा आ जाए तो इनकी हमला करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। इसके अलावा अगर इंस्खन उनके झुंड के किसी सदस्य को मार दे तो वे बदले के लिए हमला करते हैं।
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भेड़िया - फोटो : Freepik
विशेषज्ञों के मुताबिक, एक भेड़िया इंसान पर हमला कर खुद उसका मांस खाता है। फिर उल्टी कर अपने बच्चों को खाने के लिए देता है। इससे उन्हें भी इंसानी मांस खाने का चरका लग जाता है।

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बहराइच से गोरखपुर चिड़ियाघर लाया गया भेड़िया - फोटो : अमर उजाला
साथी को बचाने के लिए दे देते हैं जान
भेड़िये अपने साथी को बचाने के लिए अपनी जान भी दे सकते हैं। कई बार लोग फर्क नहीं जानने के कारण कुत्तों को भेड़िया समझ लेते हैं। वैसे सामान्य तौर पर भेड़िये आदमखोर नहीं होते हैं। वे इंसानी आबादी के आसपास ही जंगल और खखेतों में छिपकर रहते हैं। 

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भेड़िया - फोटो : iStock
पाठक बताते हैं कि भेड़ियों पर बाघ से ज्यादा विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या ज्यादा से ज्यादा 100 होगी। वहीं, पूरे देश में 2- 3 हजार ही भेड़िये होंगे। इनकी गणना न होने से वास्तविक संख्या वताना काफी मुश्किल है। हालांकि, लोगों के मुताविक भेड़ियों की संख्या कहीं ज्यादा है।


 

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भेड़िया - फोटो : freepik
आखिरी आदमखोर के खात्मे पर ही राहत
सुल्तानपुर, जौनपुर और प्रतापगढ़ में 1997 के दौरान भेड़ियों का जबरदस्त आतंक रहा था। तब इन इलाकों में भेड़ियों ने 42 बच्चे मार दिए थे। अखिल भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी वीके सिंह के मुताबिक 1997 में जब एक भेड़िया पकड़ते या मारते थे, तो खुशी होती थी कि चलो अब निजात मिती। 

 

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हरदी के कोलैला गांव में घर में भेड़िया घुसने की सूचना के बाद लाठी डंडे लेकर खड़े ग्रामीण व पुलिस - फोटो : अमर उजाला
अगले ही दिन फिर कहीं से हमले की सूचना आ जाती। इससे सबक मिला कि जब तक इंसान के बच्चों को मारने वाले असली अपराधी भेड़िये नहीं मारे जाते हैं, तब तक हमले नहीं थमेंगे। बहराइच में ही चार भेड़ियों को पकड़ने के बाद भी इंसानों पर हमले नहीं रुके हैं। साफ है कि असली आदमखोर अभी तक पकड़ा या मारा नहीं गया है।

 

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wolves attack in up - फोटो : अमर उजाला
आदमखोर भेड़ियों को सामान्य नहीं बनाया जा सकता। इन्हें या तो मारना पड़ता है या पिंजड़े में बंद करके चिड़ियाघर में रखना होता है। रूपक डे, वन्यजीव विशेषज्ञ

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wolves attack in up - फोटो : अमर उजाला
100 से ज्यादा नहीं होंगे पूरे यूपी में भेड़िये
2-3 हजार संख्या होने का अनुमान देश में
10 लोग निवाला बन चुके बहराइच में

 

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wolves attack in up - फोटो : अमर उजाला
1997 में भेड़ियों ने मारे थे 42 बच्चे
वर्ष 1997 में सुल्तानपुर, जौनपुर और प्रतापगढ़ में भेड़ियों का जबरदस्त आतंक रहा था। तब इन इलाकों में भेड़ियों ने 42 बच्चे मारे थे। इस अभियान में शामिल रहे अखिल भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी वीके सिंह बताते हैं कि भेड़ियों के झुंड में एक सरदार नर भेड़िया होता है, जिसे हम एल्फा कहते हैं। जब कभी मादा भेड़िये के बच्चों को जन्म देने के कारण कम परिश्रम में अधिक शिकार की आवश्यकता होती है तो नर सरदार भेड़िया इंसान के बच्चों को अपना शिकार बना लेते हैं। क्योंकि, इंसान इनके लिए सबसे आसान शिकार होता है।

 

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wolves attack in up - फोटो : अमर उजाला
भेड़िया के हमला करने पर इंसान का बच्चा अधिकतम 250-500 मीटर ही दौड़ सकता है और इतनी दौड़ लगाने में भेड़िये को कोई दिक्कत नहीं होती। वीके सिंह कहते हैं कि ग्रासलैंड की कमी को भेड़ियों के मानवभक्षी बनने की वजह मानना उचित नहीं है। क्योंकि, उनके लिए गेहूं के खेत भी ग्रासलैंड ही है। वे वहां आसानी से छिप सकते हैं और पानी भी उपलब्ध रहता है। वे बताते हैं कि 1997 में आदमखोर भेड़ियों को खत्म करने के लिए तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन्यजीव अशोक सिंह और पूर्वी जोन के मुख्य वन संरक्षक रामलखन सिंह खुद मैदान में उतरे थे। रात-रात भर गांव में कैंप किया करते थे, जिससे नीचे का स्टाफ भी जोश में रहता था।

 
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wolves attack in up - फोटो : अमर उजाला
आखिरी आदमखोर भेड़िये के खत्म होने पर ही काबू में आएगी समस्या
वीके सिंह बताते हैं कि तब कोई एक भेड़िया पकड़ते थे या मारकर गिराते थे, तब बड़ी खुशी होती थी कि चलो अब मुक्ति मिलेगी। नेशनल जियोग्राफिक चैनल की टीम भी हमारे साथ चल रही थी। लेकिन, अगले दिन ही पुनः कहीं हमले की सूचना आ जाती तो पता चलता कि हमारा अभियान अभी कामयाब नहीं हुआ। उससे यह सबक मिला कि जब तक इंसान के बच्चों को मारने वाले असली अपराधी "भेड़िये" नहीं मारे जाते हैं, तब तक यह सिलसिला नहीं थमेगा। बहराइच में ही चार भेड़ियों को पकड़ने के बावजूद इंसानों पर हमले नहीं रुके हैं, इसका मतलब है कि आदमखोर भेड़िये अभी पिंजरे या बंदूक की गिरफ्त में नहीं आए हैं।

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