लखनऊ सौ साल पहले 1919 में बकरीद पर गाय की कुर्बानी न होने का भी गवाह बना। वह भी किसी के दबाव या कानून के कारण नहीं, सुन्नियों के बड़े धर्मगुरु मौलाना अब्दुल बारी फरंगी महली की पहल पर। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और चाहते थे कि कोई ऐसा काम न हो जिससे अंग्रेजों की ‘बांटों तथा राज करो’ नीति सफल हो।
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डेमो
मौलाना अब्दुल बारी फरंगी महली की महात्मा गांधी से नजदीकी थी। वे मौलाना को ‘भाई’ कहकर पुकारते थे। मौलाना अब्दुल बारी फरंगी महली ने गांधी को टेलीग्राम लिखा कि इस बकरीद पर फरंगी महल में गाय की कुर्बानी नहीं होगी।
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cow
बापू ने 6 सितंबर 1919 को टाइम्स ऑफ इंडिया को भेजे पत्र में इस प्रसंग का उल्लेख किया है। महामना मदन मोहन मालवीय ने भी मौलाना को धन्यवाद देते हुए लिखा, ‘उनके प्रयासों से लखनऊ में इस बकरीद पर गाय की कुर्बानी नहीं दी गई।’
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महात्मा गांधी
मौलाना के रिश्ते में पोते मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली बताते हैं, ‘गांधीजी सबसे पहले 1916 में लखनऊ आए तो दादा से उनकी तमाम मसलों के साथ उन मुद्दों पर भी बात हुई जिनसे अंग्रेज फूट डालते थे। इससे फैसले की बुनियाद पड़ी।
उन्हीं के प्रयासों से उत्तर प्रदेश में गाय की कुर्बानी की परंपरा बंद हुई। मौलाना ने जनवरी 1920 में सहारनपुर में हिंदू-मुस्लिम एकता सम्मेलन में कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से गाय की कुर्बानी नहीं की। उन्हें महात्मा गांधी या किसी अन्य ने इससे नहीं रोका था।