कोरोना महामारी से लखनऊ का पर्यटन उबर नहीं पा रहा है। लॉकडाउन हटे लंबा वक्त गुजर गया है, लेकिन भूलभुलैया, पिक्चर गैलरी, बड़ा व छोटा इमामबाड़ा जैसी ऐतिहासिक इमारतों के दीदार के लिए पर्यटक उम्मीद से बेहद कम आ रहे हैं। इमारतों का ताला खुलने के बाद से अब तक एक माह में केवल 17 हजार 687 पर्यटक ही आए हैं। यह संख्या बीते साल अक्तूबर में आए सैलानियों की संख्या से आधे से भी कम है। ऐसे में हुसैनाबाद ट्रस्ट की आमदनी घट कर आधी से भी कम रह गई है। वहीं गाइड से लेकर इक्का-तांगा वालों के साथ इमामबाड़े के अंदर दुकानें लगाने वाले भी परेशान हैं।
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- फोटो : अमर उजाला
सत्रहवीं शताब्दी की वास्तुकला और नवाबी जमाने की बेहतरीन कारीगरी का नमूना देखने देश व विदेश से सैलानी बड़ी तादात में लखनऊ आते हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन के चलते ऐतिहासिक इमारतों को बंद रखा गया था। तकरीबन छह माह बाद बीते 24 सितंबर को धरोहरों को पर्यटकों के लिए खोला गया। उम्मीद थी कि सैलानी जुटेंगे तो गाइडों, दुकानदारों के साथ इक्का, तांगा वालों का रोजगार फिर से शुरू हो जाएगा, लेकिन अभी नाउम्मीदी ही हाथ लगी।
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बड़ा इमामबाड़ा के प्रभारी हाबीबुल हसन ने बताया कि 24 सितंबर को इन ऐतिहासिक इमारतों का ताला खुलने के बाद से अब तक एक माह में 8.84 लाख रुपये की आमदनी ट्रस्ट को हुई है। उन्होंने बताया कि बीते साल अक्तूबर में 41 हजार 133 पर्यटक इमामबाड़ा पहुंचे थे। इनसे करीब 20.56 लाख रुपये ट्रस्ट ने कमाए थे। उनका कहना है कि अभी ट्रेनें का पूरी तरह से संचालन नहीं हुआ है। वहीं फ्लाइट भी कम हैं, इसकी वजह से पर्यटक नहीं आ पा रहे हैं।
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दुकानदार भी परेशान
बड़ा इमामबाड़े के अंदर बोन ज्वैलरी की दुकान चलाने वाले राशिद बताते हैं कि लॉकडाउन के पहले एक दिन में तीन से चार हजार रुपये की बिक्री आराम से ही जाती थी। अब 500 रुपये का सामान भी नहीं बिक पा रहा है। दुकानदार मीनू की परेशानी भी इससे अलग नहीं है। वह बताते हैं कि बाहर से आने वाले पर्यटक बोन व सीप के आभूषण के साथ फिरोजाबाद, मुरादाबाद जगह की कलात्मक चीजें पसंद करते हैं। बाहर से पर्यटक नहीं आ रहे है, जिससे बिक्री कम है।
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गाइडों को परिवार चलाना मुश्किल
ऐतिहासिक इमारतों पर ट्रस्ट के करीब 85 गाइड हैं। ट्रस्ट इन्हें 4500 रुपये महीना वेतन देता है। कम वेतन पर गुजर कर रहे गाइड पर्यटकों से होने वाली अलग से आमदनी पर निर्भर रहते हैं। सैलानी कम होने से गाइडों के सामने परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया है। गाइड सैयद अंसार हुसैन का कहना है कि लॉकडाउन के छह महीने तक आमदनी रुकी हुई थी। किसी तरह गुजारा चल सका। अब इमामबाड़े तो खुल गए, लेकिन आमदनी नहीं बढ़ पा रही है। ट्रस्ट भी वेतन नहीं बढ़ा रहा है। गाइड हसन नवाब बताते है कि लॉकडाउन से पहले पर्यटकों से एक दिन में 300 से 400 रुपये की आमदनी हो जाती थी। अब 100 रुपये कमाना भी मुश्किल हो गया है। गाइड नकी हैदर बताते है कि बाहर के पर्यटक ही गाइड लेते हैं, लेकिन कोरोना के चलते बाहर के पर्यटक नहीं आ रहे हैं।
घोड़े का खर्च भी नहीं निकल रहा
ऐतिहासिक इमारतों के आसपास तांगे की सवारी कराने वालों की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। करीब 25 साल से तांगा चला रहे अब्दुल कादिर बताते हैं कि लॉकडाउन से पहले 500 रुपये रोज कमा लेते थे, अब 100 रुपये भी मुश्किल हो गया है। करीब 22 साल से तांगा चला रहे सिराज को पर्यटक नहीं मिल रहे है। वह कहते हैं कि करीब 150 रुपये रोज का घोड़े का खर्च है। अब परिवार चलाए या जानवर देखें।