पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन की स्मृतियों में डूबे सोगवारों के लबों पर अलविदा हुसैन... अलविदा हुसैन.... की सदाएं।
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अश्कों से सराबोर आंखों ने कहा, अलविदा हुसैन....
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कुछ ऐसा ही नजारा था बुधवार सुबह विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित नाजिम साहब के इमामबाड़े से निकाले गए चुप ताजिए के जुलूस का।
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अय्यामे अजा के आखिरी दिन निकले जुलूस में मर्सियाख्वानी ‘...घरों में मेहमान थे हजरत-ए-शब्बीर, विदा होते हैं हर एक से अब शाहे दिलगीर, फराक-ए-शाह की हर दिल पर चलती है शमशीर...’ का दर्द फिजा में ऐसा समाया कि हर शख्स की आंखें गमगीन हो गईं।
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नाजिम साहब के इमामबाड़े से निकला जुलूस अकबरी गेट, नक्खास चौराहा, बिल्लौचपुरा मोड़, गिरधारी सिंह इंटर कॉलेज से होते हुए मंसूर नगर और रौजा-ए-काजमैन पर समाप्त हुआ।
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इस दौरान जुलूस में शामिल अजादारों के आंसुओं का सैलाब सा आ गया। समापन पर इमामबाड़ों में अलविदाई मजलिसें हुईं, जिसमें अजादारों की ‘या हुसैन... या हुसैन....’ से आखिरी सलाम देने लगा।
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जुलूस शुरू होने के पहले भी मजलिस हुई, जिसे मौलाना मिर्जा मोहम्मद अशफाक ने संबोधित किया। उन्होंने कर्बला के शहीदों की दास्तां सुनाई।
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बताया कि रसूल के नवासे की कुरबानी से इसलाम जिंदा है। अगर, इमाम हुसैन व उनके 72 साथियों ने कर्बला में शहादत न दी होती तो मजहब का नामोनिशां खत्म हो चुका होता।
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उन्होंने इंसानियत की भी हिफाजत की। मासूम अली असगर की शहादत का जिक्र होते ही अजादार गमगीन हो गए।
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चुप ताजिया के जुलूस को लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे। जुलूस ड्रोन कैमरे की निगरानी में निकाला गया। चौराहे सीसीटीवी कैमरों से लेस थे।