एक समय था जब बड़े से बड़े पद और कद वाले नेता कायदे कानून का पूरा पालन करते थे। प्रसंग पं. दीनदयाल उपाध्याय से जुड़ा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरु जी) और जनसंघ के संस्थापक सदस्य पं. दीनदयाल उपाध्याय एक ही रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे।
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय
- फोटो : डेमो
'राष्ट्रधर्म के लंबे समय तक संपादक रहे आनंद मिश्र ने एक प्रसंग में लिखा है, 'गुरु जी प्रथम श्रेणी डिब्बे में थे जबकि पं. दीनदयाल उपाध्यय जी तृतीय श्रेणी में यात्रा कर रहे थे। एक स्टेशन पर गुरु जी ने पं. दीनदयाल उपाध्याय को संदेश भिजवाया, 'कुछ मुद्दों पर महत्वपूर्ण बात करनी है। पंडित जी डिब्बे से उतरकर गुरु जी के पास पहुंचे।
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय
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गाड़ी चल दी। विचार-विमर्श पूरा करने के बाद दीनदयाल जी एक स्टेशन पर उतरकर अपने डिब्बे में आ गए और टिकट चेकर की तलाश शुरू कर दी। मिला तो पूरी बात बताकर बोले, 'अमुक से अमुक स्टेशन तक प्रथम और तृतीय श्रेणी के किराए में अंतर का किराया भुगतान करना है।
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय
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पहले तो टिकट चेकर ने यह कहकर, 'अरे! जाने दें, ऐसा तो होता ही रहता है। पंडित जी ने कहा देखो रेलवे राष्ट्रीय सम्पत्ति है, उसकी हानि राष्ट्रीय क्षति है।