‘सॉरी’, ‘आई अपोलोजाइज’ और ‘इट्स ओके’ यह शब्द हैं बहुत छोटे लेकिन इनके मायने ऐसे हैं कि यह रिश्तों में पड़ी दरारों को कुछ पलों में ही मिटा देते हैं। मां-बाप का दिल दुखाया हो, दोस्तों से झगड़ा, जीवनसाथी से अनबन हो या ऑफिस में साथ काम कर रहे साथियों से नोकझोंक। सिर्फ सच्चे दिल से एक बार माफी मांग कर और उन्हें माफ कर के जीवन के इन महत्वपूर्ण रिश्तों को और भी खूबसूरत बना सकते हैं। अक्सर हम छोटी-छोटी बातों पर रूठ जाते हैं और सिर्फ इसलिए पहल नहीं करते क्योंकि इससे हमारे अहंकार को ठेस पहुंचती है। इसके लिए कई बार हम जीवन भर पछताते हैं कि काश वो मौका न गंवाया होता। अगर आप भी किसी अपने से नाराज हैं तो आज मौका है उन्हें माफ कर गले लगाने का। वर्ल्ड फॉरगिवनेस-डे पर राजधानी के ऐसे ही कुछ युवा जिन्होंने रिश्तों की कड़वाहट को नजरअंदाज कर किया अपनों को माफ और मिटाए दिलों के फासले। उनसे बातचीत पर पेश है एक रिपोर्ट :
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आफरीन मिर्जा
- फोटो : amar ujala
पढ़ाई को लेकर छोटे भाई से हुई थी मारपीट
मैं अपने छोटे भाई को पढ़ा रही थी। लेकिन वो पढ़ाई करने में आनाकानी कर रहा था। मुझे गुस्सा आया और मैंने उसे थप्पड़ मार दिया। उसके बाद उसने भी मुझे मारा। इसके बाद हम दोनों में करीब एक हफ्ते तक बात भी नहीं हुई। घर वालों के समझाने के बाद भी न तो उसने मुझसे माफी मांगी और न ही मैंने माफ किया। बाद में मुझे एहसास हुआ कि वो छोटा है लेकिन मैं तो बड़ी हूं। उसके बाद मैं खुद उसके पास गई और प्यार से पूरी बात समझाई। उसे भी मेरी बात समझ आई। माफ करने से नजदीकियां बढ़ती हैं। - आफरीन मिर्जा, बीटेक छात्रा
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दीपशिखा
- फोटो : amar ujala
रिश्तों के लिए कड़वाहट को नजरअंदाज करना जरूरी
करीब दस साल पहले की बात है। एक पारिवारिक झगड़े में मेरी चाची ने मुझे काफी बुरा-भला कह दिया था। परिवार में यह बात सबको बुरी लगी और बात इतनी बढ़ी कि हमारे बीच बातचीत के साथ आमना-सामना भी बंद हो गया। करीब सात सालों तक ऐसे ही चलता रहा। मुझे एहसास हुआ, भले ही मेरी गलती न रही हो लेकिन बातचीत तर्क करने से मेरे साथ परिवारों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं। उसके बाद मैंने खुद पहल की और उनसे नमस्ते किया। कुछ दिनों में हालात सामान्य हो गए। इस तजुर्बे से मैंने जाना रिश्तों को बचाने के लिए हर कड़वाहट को नजरअंदाज करना ही पड़ता है। - दीपशिखा, छात्रा- लखनऊ विवि
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स्वप्निल
- फोटो : amar ujala
नाराज भी होती हूं और मनाना भी खुद ही पड़ता है
हमारे परिवार में माता-पिता के अलावा मेरी दो छोटी बहनें श्रुति और सौम्या हैं। वैसे तो हममें बहुत प्यार है लेकिन शायद ही कोई दिन गुजरता हो जब हम सब में झगड़ा न होता हो। कभी एक-दूसरे के कपड़े पहनने को लेकर कभी किसी और बात पर। लेकिन यह झगड़ा ज्यादा देर तक नहीं चलता। मैं सबसे बड़ी हूं भले मुझे अपनी छोटी बहनों पर कितना भी गुस्सा आए लेकिन कुछ देर बाद अपना गुस्सा भूलकर मैं खुद उन्हें मनाती हूं। क्योंकि जिंदगी में रिश्ते सबसे बढ़कर होते हैं। - स्वप्निल, रिसर्च स्कॉलर
कमजोर नहीं परिपक्व लोग करते हैं माफ
लोग समझते हैं कि जो लोग माफी मांगने या माफ करने में पहल कर देते हैं वो कमजोर होते हैं। लेकिन ऐसा हरगिज नहीं है। माफ सिर्फ वो लोग ही कर सकते हैं तो परिपक्व (मैच्योर) होते हैं। मेरे भी कई बार मेरे दोस्तों से झगड़े हो जाते हैं। कुछ दिनों पहले मेरा झगड़ा मेरी बेस्ट फ्रेंड सोनल से हो गया था। हमारे बीच करीब दोमाह तक बातचीत बंद रही। हम दोनों ही बात करना चाहते थे लेकिन शायद बीच में इगो आ जाता था। बाद में बातचीत में खुद पहल की। आज फिर से हम दोनों बहुत अच्छी दोस्त हैं। - फरहीन, छात्रा