गोमती तट पर बसे मनकामेश्वर मन्दिर का इतिहास रामायण काल का है। कहा जाता है कि सीता को वनवास छोड़ने के बाद जब लक्ष्मण अयोध्या वापस जा रहे थे तो उनका मन बहुत खिन्न था। उदास मन से गोमतीं तट पर उन्होंने रात भर विश्राम किया और सुबह शिव की आराधना की जिससे उनके मन को शांति मिली। इस घटना के बाद यहां शिव मंदिर का निर्माण हुआ। मन्दिर के बारे में मान्यता है कि यहां दिल से मांगी हर कामना पूरी होती है। लिहाज़ा मन्दिर का नाम मनकामेश्वर रख दिया गया।
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- फोटो : amar ujala
मन्दिर की महंत देव्यागिरी प्रदेश की एकमात्र महिला महंत हैं। बीएससी करने के दौरान वो अक्सर मन्दिर आती रहती थीं लेकिन एक बार मंदिर में उनके साथ एक अजीब घटना हुई।
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महंत देव्यागिरी
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वो कहती हैं जब मैं मन्दिर आई और शिवलिंग पर हाथ रखा तो लगा कि शिवलिंग गायब हो गया और शरीर मे कुछ अजीब सा होने लगा। आंखों के नीचे अंधेरा छा गया और डर भी लगा कि पुजारी जी से क्या बताउंगी की शिवलिंग गायब हो गया। बहुत देर तक ऐसी ही हालत में रही और फैसला लिया कि अब शिव जी की भक्ति में ही जीवन व्यतीत करूंगी।
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देव्यागिरी के पिता आज अखबार में ब्यूरो चीफ थे। घर मे बहनें भी हैं लेकिन उनका लालन-पालन ननिहाल में ज़्यादा हुआ। जब उन्होंने घर में बताया कि वह शिव जी के चरणों मे रहना चाहती हैं तो घर में 9 दिन तक चूल्हा नही जला। किसी ने खाना नहीं खाया। ऐसा लग रहा था जैसे किसी की मय्यत हो गयी है लेकिन देव्यागिरी का फैसला अटल था। परिवार भी हार गया उनके आगे और वह 24 साल की उम्र में साल 2008 में मनकामेश्वर मन्दिर की महंत बन गयी।
मन्दिर में सुबह शाम आरती होती है और भक्तों का तांता लगा रहता हैं। वहीं, सावन के महीने में पूरे प्रदेश से भक्त आते हैं। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था का विशेष प्रबंध किया जाता है ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की समस्या न हो।