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मातृभाषा में उन्नति की राह दिखा रहे शिक्षक, बोले- हिंदी में सबको जोड़ने की अनोखी कला

Sat, 05 Sep 2020 03:11 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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सोनम तोमर, प्रेम शंकर शास्त्री - फोटो : amar ujala
किसी भी बच्चे को अपनी मातृभाषा का व्यवस्थित ज्ञान विद्यालय से ही प्राप्त होता है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं शिक्षक। आज हम ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत आपको मिलवा रहे हैं लखनऊ के ऐसे ही शिक्षकों से जिन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी के उत्थान और विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा के प्रति आकर्षित करने के प्रयास में लगा दिया। वे आज भी हिंदी विषय के माध्यम से न सिर्फ छात्र-छात्रों में अलख जगा रहे हैं बल्कि उन्हें हिंदी में भविष्य निर्माण की राह भी दिखा रहे हैं।


 
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प्रो. योगेंद्र सिंह - फोटो : amar ujala
भाषाविदों और लोकगीतों पर काम कर रहे प्रो. योगेंद्र
लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र सिंह ने हिंदी भाषाविदों को लेकर लेखन में बड़ा काम किया है। साथ ही वे दस हिंदी भाषी प्रदेशों के लोकगीतों के संकलन पर भी काम कर रहे हैं। प्रो. योगेंद्र के संरक्षण में 30 से ज्यादा विद्यार्थी शोध कर चुके हैं। बहुत से छात्र नेट-जेआरएफ  में सफल हुए तो सैकड़ों छात्र हिंदी विषय से पढ़ाई कर अच्छे पदों पर आसीन हैं। इनमें प्रशासनिक सेवा से लेकर अन्य विभागों के अधिकारी शामिल हैं।
वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की स्थिति सुखद
प्रो. योगेंद्र सिंह मानते हैं कि शिक्षा का चाहे जितना अंग्रेजीकरण हो गया हो लेकिन वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की स्थिति बहुत सुखद है। पूरे विश्व में हिंदी और हिंदी साहित्य में बहुत काम हो रहा है। प्राइमरी से लेकर विवि स्तर तक और प्रशासनिक व अन्य विभागों में हिंदी रोजगार की भाषा बन रही है। अब तो हिंदी में नए-नए शोध कार्य हो रहे हैं। प्रो. योगेंद्र कहते हैं कि पूरे भारत को एकीकृत करने के लिए मातृभाषा हिंदी बहुत जरूरी है। जहां तक बच्चों का प्रश्न है तो हिंदी में कम अंक आने वाले छात्र और उनके अभिभावक इसे मातृभाषा मानकर हिंदी विषय पर कम ध्यान देते हैं जबकि गणित व अन्य विषयों के ट्यूशन लगाते हैं। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति से मातृभाषा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी।

 
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डॉ शिवमंगल - फोटो : amar ujala
प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिवार्यता के साथ रोजगार की भाषा बने हिंदी
राजकीय हाईस्कूल खंदारी बीकेटी से सेवानिवृत्त शिक्षक डॉ. शिवमंगल सिंह ‘मंगल’ अब तक हिंदी और बुंदेली भाषा में दस से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से उन्हें मैथिली शरण गुप्त सम्मान से पुरस्कृत भी किया जा चुका है। उनकी पुस्तकों पर शोध भी हुआ है। हिंदी को रोजगार की भाषा बनाये जाने के शुरू से पक्षधर रहे डॉ. शिवमंगल सिंह कहते हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में जब तक हिंदी को अनिवार्य नहीं किया जाएगा तब तक युवाओं का अपेक्षाकृत झुकाव हिंदी की ओर नहीं होगा। उनका मानना है कि अन्य प्रांतों में भी हिंदी को अनिवार्य किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि पिछली सरकारों की नीतियां भी अंग्रेजी को बढ़ावा देने वाली रही हैं। नई शिक्षा नीति से जरूर कुछ उम्मीद जगी है, लेकिन इसका पूरी तरह पालन होने से ही सफलता मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की तरह अगर मीडिया जागरूकता कार्यक्रम चलाए तो भी काफी सुधार की आशा है।

 

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डॉ रामबहादुर मिश्र - फोटो : amar ujala
निबंध लेखन और काव्य प्रतियोगिताओं से छात्रों में जगाया हिंदी प्रेम
इसी वर्ष जूनियर हाईस्कूल से सेवानिवृत्त डॉ. रामबहादुर मिश्र ने अपने छात्रों में हिंदी के प्रति रुचि को बढ़ावा देने के लिए निबंध लेखन व काव्य लेखन जैसी प्रतियोगिताओं का सहारा लिया। उनका यह प्रयोग काफी सफल रहा। वर्ष 2016 में उनकी उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हिंदी और अवधी भाषा के उत्थान के लिए उन्होंने दस से ज्यादा देशों की यात्राएं कीं। कई देशों में उन्हें सम्मानित किया गया। एक दर्जन किताबें लिख चुके और इतनी ही पुस्तकों का संपादन कर चुके डॉ. मिश्र को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से उनकी पुस्तकों के लिए चार बार सम्मानित किया जा चुका है। विद्यालयों में हिंदी शिक्षकों को कमी पर चिंता जताते हुए कहा, हिंदी के विकास के लिए सम्मिलित प्रयासों की जरूरत है। डॉ. मिश्र ने कहा कि अमर उजाला का ‘हिंदी हैं हम’ अभियान मातृभाषा के उत्थान के लिए चलाया जाने वाला मेरी याददाश्त में सबसे सफल प्रयोग है। ऐसे अभियान ही हिंदी के विकास में सहायक सिद्ध होंगे।

 
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राजेंद्र शुक्ल - फोटो : amar ujala
पाठ्यक्रम की कहानियों की पटकथा लिख उनका मंचन भी करते हैं राजेंद्र शुक्ल
एसकेडी एकेडमी इंटर कॉलेज, राजाजीपुरम में हिंदी के प्रवक्ता राजेंद्र शुक्ल अपने विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए शिक्षण के साथ ही नए प्रयोग भी करते हैं। वे बताते हैं कि मैंने अपनी कक्षाओं में सदैव हिंदी को बच्चों के समक्ष रुचिकर रूप में रखा, उन्हें विभिन्न उदाहरणों से बताता हूं कि यह भाषा संस्कृत की दुहिता होने के नाते सर्वाधिक वैज्ञानिक है और जीवन को गरिमामय ढंग से जीने का सलीका भी सिखाती है। बताया, हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए मैंने अपने विद्यालय में पाठ्यक्रम में शामिल कई कहानियों की पटकथा लिखकर उनका मंचन भी बच्चों द्वारा कराया है। वे बताते हैं कि इंटरमीडिएट की पढ़ाई समाप्त करते-करते प्रतिवर्ष एक-दो बच्चे कवि या लेखक के रूप में अपनी भावनाओं को कागज पर उतारना शुरू कर देते हैं।

अमर उजाला का अभियान प्रेरणादायी
वे कहते हैं कि अमर उजाला का ‘हिंदी है हम’ अभियान देश भर के हिंदी सेवियों और हिंदी प्रेमियों के लिए प्रेरणादायी है। लगभग दो दशकों से मैंने हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग का अभियान चला रखा है।



 
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प्रेम शंकर शास्त्री - फोटो : amar ujala
हिंदी में सबको जोड़ने की अनोखी कला
महाराजा अग्रसेन इंटर कॉलेज मोतीनगर में हिंदी के प्रवक्ता और मार्तंड साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था के स्थानीय सलाहकार प्रेम शंकर शास्त्री कहते हैं कि हिंदी में सभी को जोड़ने की अनोखी कला है। विद्यार्थियों को हिंदी के प्रति आकर्षित करने के लिए वे नित नए प्रयोग तो करते ही रहते हैं, साथ में अपनी कविताओं, कहानियों और लेखों के माध्यम से हिंदी का प्रचार करते हैं। उनका काव्य संग्रह मेरी जिज्ञासा प्रकाशित हो चुका है।
 
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प्रो. कमल कुमार - फोटो : amar ujala
गुरु के मार्गदर्शन से अंग्रेजी माध्यम से होकर भी बच्चों को पढ़ाने लगे हिंदी
गुरुजी ने सिखाया बच्चों को कैसे पढ़ाएं हिंदी
लविवि से अंग्रेजी माध्यम में परास्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुझे जेएनपीजी कॉलेज में पढ़ाने का मौका मिला। मैंने अंग्रेजी माध्यम से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो विद्यार्थियों ने हिंदी माध्यम से पढ़ाने का अनुरोध किया। मेरे लिए यह बहुत कठिन था, लेकिन गुरु प्रो. एलडी ठाकुर से इस संबंध में बात की। उन्होंने कहा कि सबसे पहले वे पुस्तकें पढ़ो जिनका प्रकाशन हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यम से हुआ हो। दोनों माध्यम की किताबें पढ़ने से काफी चीजें समझ में आईं और मैंने बच्चों को हिंदी में पढ़ाना शुरू कर दिया। आज भी मैं अपनी क्लास में हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यम से पढ़ाता हूं। - प्रो. कमल कुमार, अवैतनिक पुस्तकालयाध्यक्ष, लविवि 
 

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प्रो. प्रशांत श्रीवास्तव - फोटो : amar ujala
पिताजी और गुरु की वजह से हिंदी पर बना अधिकार
मेरी पढ़ाई सेंट फ्रांसिस स्कूल से हुई थी। पिताजी प्रियोनाथ श्रीवास्तव सूचना अधिकारी थे और हिंदी और अंग्रेजी के शानदार जानकार थे। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्हें काफी दिनों तक हिंदी-अंग्रेजी प्रेस नोट के एडिटर के तौर पर रखा गया। उनका प्रभाव था कि मैंने बीए में एआईएच के साथ ही हिंदी और अंग्रेजी दोनों विषय लिए। दोस्तों ने डराया कि अब हिंदी नहीं पढ़ पाओगे, पर शिक्षक प्रो. केके थपलियाल ने हौसला बढ़ाया। उनके सहयोग से आज में शिक्षक हूं। हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यम के विद्यार्थियों को पढ़ा रहा हूं। - प्रो. प्रशांत श्रीवास्तव, लविवि 

 

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सोनम तोमर - फोटो : amar ujala
बचपन की तुकबंदियां गुरु के सान्निध्य से कविताओं में ढली
मैं बचपन से ही तुकबंदी करके चार लाइन बना देती थी। बाद में पता चला कि ये कविता है। पढ़ाई के साथ इसे भी करती रही। बीकॉम, एमकॉम और इस दौरान पत्रिकाओं में समीक्षा और फिल्म समीक्षा भी की। जब बीबीएयू में एमए कर रही थी तो सर्वेश सिंह सर ने मेरे शौक को तराशा। उन्हें कविता लिखकर दिखाती तो उसे ठीक करते थे। इससे मेरा रुझान फिर हिंदी कविता की ओर बढ़ा। एमए में गोल्ड मेडल मिला। मैं सर से प्रभावित होकर ही शोध की तरफ मुड़ी। अगर आपको सही मार्गदर्शन देने वाले शिक्षक मिल जाएं तो आप किसी भी क्षेत्र में सफल हो सकते हैं। - सोनम तोमर, शोध छात्रा, हिंदी विभाग, बीबीएयू 
 
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डॉ अलका सिंह - फोटो : amar ujala
अंग्रेजी पढ़ते-पढ़ते हिंदी साहित्य में बढ़ी रुचि 
स्कूली पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से की, लेकिन पढ़ाई के दौरान ही हिंदी लेखन और साहित्य में ऐसी रुचि बढ़ी की आज भी हिंदी रचनाएं लिख रही हूं। हिंदी एक विशाल भाषा शैली है। इसका स्वरूप बहुत बड़ा है। भारतीय जड़ों से जुड़ा है। हिंदी के शब्दों में जो शालीनता है वह अंग्रेजी के शब्दों में देखने को नहीं मिलती। यही वजह है कि जब अपने विचारों को शब्दों में ढलने का प्रयास करती हूं तो हिंदी भाषा से अच्छा माध्यम मुझे नहीं दिखता।  - डॉ. अलका सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय 
 
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