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दिव्यांगजनों के इस हौसले को सलाम, अपनी कमजोरियों को बनाई ताकत अब दूसरों का बन रहे सहारा

Tue, 03 Dec 2019 05:07 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
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सूर्य प्रताप शर्मा और सुहास - फोटो : अमर उजाला
कोई भी व्यक्ति जिंदगी के इम्तिहान में तब तक नाकाम नहीं हो सकता, जब तक कि उसके हौसले बुलंद रहेंगे। इसे सच साबित कर दिखाया है कुछ ऐसे लोगों ने, जिन्होंने अपनी कमजोरियों पर रोेने के बजाय, उसे अपनी ताकत बना लिया। इन्हें दुनिया दिव्यांगजनों की श्रेणी में रखती है। नियति को कोसने के बजाय उन्होंने कमियों को एक अवसर माना और साबित कर दिया कि उनमें वो जुनून है जो जीत के लिए चाहिए, उनके खून में उबाल है और आसमां को जमीं पर लाने का इरादा रखते हैं ये दिव्यांगजन। आज अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस पर आइए कुछ सीखते हैं उनसे और सलाम करते हैं उनकी हिम्मत को। इनमें से कुछ को उनकी कोशिशों के लिए राज्य सरकार मंगलवार को आयोजित समारोह में पुरस्कृत करेगी। एक रिपोर्ट...।

 
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सुनील तिवारी - फोटो : अमर उजाला
पैर नहीं, फिर भी दे रहे हैं दूसरों को सहारा
एसजीपीजीआई के ब्लड बैंक में कार्यरत सुनील तिवारी का एक पैर कट गया है। उन्होंने आर्टिफिशियल पैर लगवाया है, लेकिन ऑफिस के काम में किसी से पीछे नहीं रहते हैं। वह बताते हैं कि उन्हें आर्टिफिशियल पैर दौड़ में कई पुरस्कार भी मिले हैं। पैर कटने की वजह बनी थी आंधी। 1995 में वह घर के सामने खड़े थे। अचानक आंधी आई और पेड़ गिर पड़ा। वह पेड़ के नीचे इस तरह दबे की उनका एक पैर काटना पड़ा। घाव भरने के बाद केजीएमयू के लिंब सेंटर से आर्टिफिशियल पैर बनवाया। एसजीपीजीआई प्रशासन ने भी सहयोग दिया। अब वह मरीजों की सेवा में लगे हुए हैं।
सब साथ हैं अपने : सभी के सहयोग से जिंदगी खुशी से चल रही हैं। मेरी कोशिश है कि सभी साथी कर्मचारियों के कंधे से कंधा मिलकार काम करूं।
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सुहास एल वाई - फोटो : अमर उजाला
डर के आगे जीत है: सुहास
विशेष सचिव नियोजन सुहास एल वाई की पहचान एक ऐसे पहले ब्यूरोक्रेट के रूप में है, जिन्होंने 2016 में एशियन पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप में गोल्ड जीता। इसके बाद खेलों में सफलता का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है। एशिया चैंपियनशिप, टर्कीश ओपन पैरा बैडमिंटन चैंपियन, जापान ओपन पैरा बैडमिंटन चैंपियनशिप समेत कई नेशनल व इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में उन्होंने खुद की श्रेष्ठता साबित की। वे कहते हैं कि शारीरिक अक्षमता को मैंने अपने परिवारवालों के सहयोग से मात दी। काम करना, मेहनत करना उनकी आदत है मजबूरी नहीं। मार्च 2018 में दूसरी राष्ट्रीय पैरा बैडमिंटन प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतने वाले राज्य सरकार उनकी उपलब्धियों के लिए विश्व दिव्यांगजन दिवस पर सम्मानित कर चुकी है।
अनुकंपा नहीं सहयोग मिले : हर किसी को सबकुछ नहीं मिलता। सबसे पहले अपने ऊपर शक करना छोड़ें, आत्मविश्वास को अपना साथी बनाएं। दूसरी सबसे बड़ी बात, दिव्यांग अपने लिए अनुकंपा की अपेक्षा न करें और समाज भी अनुकंपा नहीं सहयोग करने की भावना रखे।

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सूर्य प्रताप शर्मा - फोटो : अमर उजाला
चारों तरफ फैली है ‘सूर्य’ की आभा
पैरा रेसल सूर्य प्रताप शर्मा 2017 के विश्व कप विजेता हैं। छह नेशनल गेम, चार में गोल्ड मेडल, सिल्वर और ब्रांज अभी तक उनके खाते में है और तैयारी एक बार और विश्व विजेता बनने की है। महज डेढ़ साल की उम्र में तेज बुखार और पोलियो ने दोनों पैरों की ताकत छीन ली, लेकिन नियति से लड़ने को ही जैसा उनका जन्म हुआ था। कहते हैं, जब तक बच्चा था, तब तक लोगों की उपेक्षा को समझ नहीं पाया था। मेरे स्कूल में जिस दिन कोई प्रोग्राम होता, मेरी छुट्टी कर दी जाती थी, क्योंकि मुझे संभालेगा कौन। कहीं भी मुझे एक ‘यूनीक पीस’ की तरह से देखा जाता था। एक वक्त था कि पढ़ाई छोड़ दी, पर सूर्य को तो चमकना ही था। एमबीए पूरा किया। ट्रेन के कोच में सैनिकों के  साथ ने रेसलर बना दिया। केडी सिंह बाबू स्टेडियम में प्रेक्टिस शुरू हो गई। परिवार ने साथ दिया और दुनिया में रोशन किया नाम। फिलहाल तैयारी वर्ल्ड कप की है। उनकी इन तमाम उपलब्धियों के चलते प्रदेश सरकार आज उन्हें पुरस्कृत करेगी।
खुशी है कि बदल रही सोच
कल तक जो मुझे दयनीय भाव भरी नजर से देखते थे, आज वही मेरे आसपास, मेरे साथ हौसला बढ़ाते, सहयोग देते नजर आते हैं। खुशी है कि सोच बदल पाया हूं।
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नरेश यादव - फोटो : अमर उजाला
जान बचाने में पैर गंवाया, फिर भी नहीं टूटा हौसला
अभियोजन कार्यालय में कार्यरत हेड कांस्टेबल नरेश यादव का एक पैर कट गया है। वह केजीएमयू लिंब सेंटर की कार्यशाला से आर्टिफिशियल पैर लगवाए हैं, लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं। आर्टिफिशियल पैर लगने के बाद वह अन्य साथियों की तरह आसानी से कार्यालय का काम निपटाते हैं। पैर कटने के पीछे की कहानी भी अजीब है। मैनपुरी के करहल निवासी नरेश बताते हैं कि नवंबर 1996 में वह कांस्टेबल थे। चारबाग थानाध्यक्ष के साथ गश्त पर निकले। इसी बीच एक दुर्घटना हुई। वह दुर्घनाग्रस्त लोगों को निकाल रहे थे कि पीछे से तेज गति से आई जीप ने उनके पैर में टक्कर मार दी, जिससे पैर कट गया।
यही सच है: जो कुछ मेरे साथ हुआ उसके बाद पहले तो लगा दुनिया खत्म हो गई, लेकिन हौसले बुलंद हो तो एक जिंदगी की नई शुरुआत की जा सकती है।



 
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