29 नवंबर को लखनऊ जू अपनी स्थापना के 98 साल पूरे करने जा रहा है। बाग से नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान तक की इस लंबी यात्रा की शुरुआत 10 वन्यजीवों से हुई थी, जो आज एक हजार के पार है। वहीं, 10 पैसे के टिकट से 80 रुपये का सफर भी कम दिलचस्प नहीं है। आज (शुक्रवार) जू 98 साल पूरे कर 99वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। स्थापना के इस खास मौके पर हम नजर डाल रहे हैं कुछ अनसुने किस्सों और बीते हुए कल पर...।
Trending Videos
विज्ञापन
2 of 8
लखनऊ प्राणि उद्यान
- फोटो : अमर उजाला
आमों के बाग से जू बनने तक का सफर
प्राणि उद्यान की स्थापना 29 नवंबर, 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के लखनऊ आगमन पर की गई थी। निदेशक जू आरके सिंह ने बताया कि परिसर की स्थापना 18वीं सदी में आमों के बाग के रूप में अवध के तत्कालीन नवाब नसीरूद्दीन हैदर ने बनारसी बाग के रूप में करवाई। स्थापना के बाद 1926 तक इसमें 26 भवनों का निर्माण कराया गया तब इसकी लागत 2.08 लाख रुपये आई। मुख्य गेट का निर्माण 1936 में हुआ और नाम रखा सर लुडोविक पोर्टर गेट। प्रबंधन के लिए बनाई गई कमेटी में कमिश्नर लखनऊ पहले अध्यक्ष बने, आजादी के बाद 1950 में कमेटी के स्थान पर लोक स्वास्थ्य विभाग के आधीन एडवाइजरी कमेटी बनी और निदेशक, चिकित्सा और स्वास्थ्य को इसका प्रशासक बनाया गया। 1966 में इसका प्रशासनिक नियंत्रण वन विभाग को मिला।
विज्ञापन
3 of 8
लखनऊ प्राणि उद्यान
- फोटो : अमर उजाला
वर्ष 2001 में प्राणि उद्यान का नाम प्रिंस ऑफ वेल्स जूलोजिकल गार्डेन्स ट्रस्ट’ से लखनऊ प्राणि उद्यान और वर्ष 2015 में लखनऊ प्राणि उद्यान से नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान, लखनऊ हुआ। 29 हेक्टेयर में बने 152 बाड़ों में (मछलीघर के इनक्लोजर को छोड़कर) 1012 वन्यजीव एवं उनकी 104 प्रजातियां मौजूद हैं। मछलियों की लगभग 65 प्रजातियां हैं। जू को तीन आईएसओ प्रमाण पत्र मिल चुके हैं। एक साथ तीन प्रमाण पत्र पाने वाला ये देश का एकमात्र प्राणि उद्यान है।
4 of 8
लखनऊ प्राणि उद्यान
- फोटो : अमर उजाला
कभी जू की शान थे कंगारू, याक और पांडा
कंगारू, याक और पांडा भी कभी जू के मेहमानों में शुमार थे, जिन्हें देखने दर्शक खूब जुटा करते थे। जू का सबसे पुराना बाड़ा बलरामपुर लॉयन हाउस 1925 को बना, जहां बब्बर शेर रहते हैं। जू से पिछली तीन पीढ़ियों से जुड़े लॉयन-टाइगर स्पेशलिस्ट कीपर मुबारक अली बताते हैं कि जू में कंगारू भी रहा करते थे। दर्जन भर से अधिक कंगारू दो रंगों के थे। 80 के दशक में जब जू से कंगारू खत्म हुए तो पहाड़ों पर पाया जाने वाला याक भी कई सालों तक यहां रहा। मौजूदा हवासील सांभर के बाड़े में पहाड़ी वीबर और पांडा भी कुछ समय तक जू की शान बने रहे। उन्हें पहाड़ी मौसम मिले इसके लिए बाड़े में एक कमरे में फ्रीजर लगाया था। बर्फ की मशीन बीवर (छोटे आकार का भालू सा जीव) के लिए लगी थी। 1950 के दशक में प्रधानमंत्री पं. नेहरू भी यहां आए थे।
विज्ञापन
5 of 8
लखनऊ प्राणि उद्यान
- फोटो : अमर उजाला
10 पैसे में लोग करते थे जू की सैर
एक समय था जब जू का प्रवेश टिकट 10 पैसे का हुआ करता था। 70 के दशक में इतने दामों तक होने वाली सैर का टिकट 1985 आते-आते चार आना, आठ आना होते हुए एक रुपये तक जा पहुंचा। 90 के दशक की शुरुआत में ये करीब 10 रुपये वयस्क और 5 रुपये अवयस्क हुआ, जो 2013 तक 30 रुपये तक पहुंच गया। 2013 के बाद 60 रुपये और 30 रुपये के टिकट के बाद हाल ही में ये वयस्कों के लिए 80 रुपये और अवयस्कों के लिए 40 रुपये हुआ।
विज्ञापन
6 of 8
लखनऊ प्राणि उद्यान
- फोटो : अमर उजाला
बलरामपुर रियासत ने तैयार करवाया था लॉयन हाउस
बलरामपुर रियासत की ओर से 1925 में बलरामपुर लाॅयन हाउस का निर्माण कराया था, जहां पहली बार बलरामपुर से आए बब्बर शेर की दहाड़ गूंजी। कुछ सालों बाद इसकी मौत हो गई। इसके बाद कोलकाता जू से एक जोड़ा बब्बर शेर का लाया गया, जिसने यहां अपना कुनबा बढ़ाया। अगले 15-20 सालों में कुनबा बढ़ने पर बब्बर शेरों को ठीक सामने एक नए बाड़े (मौजूदा सफेद बाघ का बाड़ा) में बसाया गया। दोनों ओर बब्बर शेरों की दहाड़ से जू लंबे समय तक गूंजता रहा।
विज्ञापन
7 of 8
लखनऊ प्राणि उद्यान
- फोटो : अमर उजाला
इनके हाथ में रहा वन्यजीवों की देखभाल का जिम्मा
पुराने स्टाफ के मुताबिक बाराबंकी के एक रिटायर्ड सैन्य अधिकारी डॉ. कल्लन जू के वन्यजीवों की देखभाल किया करते थे। बाद में नरही के एक चिकित्सक और कैसरबाग के डॉ. डाबर हुसैन ने वन्यजीवों की देखरेख की जिम्मेदारी संभाली। 80 के दशक में डॉ. आरके दास ने लंबे समय तक कमान संभाली, लेकिन वर्ष 1995 में गैंडे ने उन पर हमला कर दिया, जिससे उनका निधन हो गया। आज उपनिदेशक डॉ. उत्कर्ष शुक्ला, डॉ. अशोक कश्यप टीम के साथ वन्यजीवों के स्वास्थ्य की देखभाल कर रहे हैं।
इन्होंने बढ़ाई जू की शान
- जू में बोटिंग पांड, फूडकोर्ट, कैंटीन, 3डी ऑडिटोरियम, प्रकृति शिक्षण केंद्र, सेल्फी पॉइंट, तितली पार्क, वेटिंग जोन
- 60 के दशक में जू पहली बाल रेल दौड़ी, जो पूरे जू का नजारा दिखाती। तब से दो ट्रेनें बदली जा चुकी हैं। मौजूदा ट्रेन 2013-2014 में तैयार हुई। इसमें 84 लोग घूम सकते हैं।
- 1983 में जू के राज्य संग्रहालय परिसर में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू व इंदिरागांधी का राजहंस हवाई जहाज पहुंचा। इससे लोकप्रियता पूरे प्रदेश में बढ़ी।