अखिलेश-मायावती की दोस्ती में शिवपाल बने रोड़ा, बसपा को बदलनी पड़ी रणनीति

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 09 Mar 2018 08:22 AM IST
अखिलेश यादव व शिवपाल सिंह यादव के बीच सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा है ये तो होली के एक कार्यक्रम में दिख ही गया। वहीं, शिवपाल भी मौका मिलने पर अखिलेश को बख्शने के मूड में नही हैं। गोरखपुर व फूलपुर के उपचुनाव में बसपा, सपा के उम्मीदवारों का समर्थन कर रही है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में दोनों पार्टियों के गठबंधन पर मायावती ने अभी स्पष्ट रुख नहीं दिखाया। कहा तो ये तक जा रहा है कि मायावती ने राज्यसभा की दसवीं सीट के लिए अंतिम समय में अपनी रणनीति बदलते हुए भीमराव अंबेडकर को प्रत्याशी बनाया। इसके पहले उनके भाई आनंद कुमार को बसपा की तरफ से राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने के कयास लग रहे थे। लेकिन उनकी बदली रणनीति के पीछे कहीं न कहीं शिवपाल यादव के रूख को भी एक कारण माना जा रहा है।

दरअसल, यूपी विधानसभा में बसपा के 19, सपा के 47 व कांग्रेस के सात विधायक हैं। ऐसे में बसपा के प्रत्याशी को राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए जरूरी 37 विधायकों के समर्थन के लिए सपा के अतिरिक्त वोटों के साथ ही कांग्रेस के अलावा अन्य दलों से भी समर्थन की आस है। पर, लोकसभा उपचुनाव, राज्यसभा व विधान परिषद चुनाव के लिए सपा और बसपा के बीच समर्थन के प्रयोग पर सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने ही सवाल उठा दिए। उन्होंने उपचुनाव में किसी से गठबंधन करने पर सपा का ही नुकसान होने की बात कही है। सपा में कम से कम पांच-छह विधायक शिवपाल के इशारे पर चलने वाले माने जाते हैं। ऐसे में बसपा को इस बात का भरोसा शायद नहीं हो रहा है कि सपा के सभी अतिरिक्त वोट उसे मिल सकेंगे।

हालांकि, बसपा की तरफ से यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि उनके और सपा के बीच अब पहले जैसी तल्खी नहीं है। मायावती के दिल और दिमाग में अखिलेश को लेकर उस तरह की शत्रुता का भाव नहीं है जैसा कि गेस्ट हाउस कांड को लेकर मुलायम को लेकर हुआ करता था। मायाराज के स्मारकों मे दफ्तर खुलवाने, उनके घर के सामने पुल बनवाने और आंबेडकर उद्यान का नाम जनेश्वर मिश्र पार्क रखने को लेकर भी तल्खी रही है, लेकिन दोनों ने वक्त और समीकरणों से बहुत कुछ सीखा है। समीकरण मायावती के अनुकूल बैठे तो वे अखिलेश के साथ खड़ी हो सकती हैं।

दोनों का विधानसभा चुनाव के नतीजों की पूर्व संध्या पर भी एक-दूसरे को लेकर नरम टिप्पणियों व गठबंधन की संभावनाओं को स्वीकार करना अकारण नहीं था। इसीलिए त्रिपुरा सहित पूर्वोत्तर के राज्यों के नतीजों में भाजपा को मिली अच्छी सफलता के अगले दिन ही बसपा ने उप चुनाव के बहाने सपा के समर्थन का एलान कर दिया। बसपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि विपक्ष को अगर भाजपा को रोकना है तो उनकी सुप्रीमो मायावती के मन के मुताबिक आगे बढ़ना होगा। इन सब बातों को देखते हुए कहा ये भी जा रहा है कि दोनों की दोस्ती कितनी परवान चढ़ती है ये काफी कुछ गोरखपुर व फूलपुर के चुनाव परिणामों से तय होगा।

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