संजय गांधी पीजीआई ने देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के साथ मिलकर अभिभावकों के लिए एक महत्वपूर्ण सुझाव तैयार किया है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि 24 महीने की उम्र तक बच्चे को टॉयलेट ट्रेनिंग देने की जरूरत नहीं है।
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वहीं तीन से चार वर्ष की उम्र के बच्चों के लिए भी यह आदत विकसित करने के लिए अलग-अलग सुझाव दिए गए हैं। बच्चों में बढ़ते फंक्शनल कॉन्स्टीपेशन के मामलों को देखते हुए उनके खानपान की आदतों से लेकर चिकित्सा तक पर दी गई जानकारियों को सामने रखा गया है।
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कब्ज बच्चों में सामान्य समस्या है। कई देशों में अपने परिस्थितियों के अनुसार इससे निपटने के लिए गाइडलाइंस हैं, लेकिन भारत में ऐसी गाइडलाइंस नहीं थीं। इस समस्या को समझने के लिए इंडियन सोसाइटी ऑफ पीडियाट्रिक गेस्ट्रोइंट्रोलॉजी, हिपेटोलॉजी और न्यूट्रिशन की ओर से यह रिपोर्ट तैयार करवाई गई।
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इसमें एसजीपीजीआई लखनऊ के चिकित्सक सुरेंद्र कुमार याचा, अंशु श्रीवास्तव और गुड़गांव व जयपुर के दो जाने माने निजी अस्पतालों से डॉ. नीलम मोहन, डॉ. ललित भरड़िया व डॉ. मोइनक सेन सरमा शामिल हुए।
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देश के विभिन्न हिस्साें में बाल रोग विशेषज्ञों के अनुभवों को साझा किया गया। सामने आया कि बच्चों में पेट से जुड़ी समस्याओं के 30 प्रतिशत मामलों में फंक्शनल कांस्टीपेशन है। इन्हीं अनुभवों के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई।
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सामान्य नित्यकर्म पर रखें नजर
भारतीय परिप्रेक्ष्य में बच्चों में नित्यकर्म की आदतों और फ्रीक्वेंसी को लेकर बहुत कम अध्ययन हुए हैं। मौजूदा अध्ययन के आधार पर रिपोर्ट में बच्चाें में सामान्य व औसत नित्यकर्म को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई।
- एक महीने की उम्र दिन में तीन से चार दफा
- एक महीने से एक वर्ष 1.5 से दो दफा
- एक वर्ष से दो वर्ष एक से दो दफा
- दो वर्ष से अधिक दिन में एक दफा
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ये हैं कब्ज की वजहें
- जन्म के छह महीने बाद भी नवजात को केवल दूध पर आश्रित रखते हुए हल्का ठोस भोजन न देना कब्ज की वजह बन रहा है।
- प्रमुख वजह के तौर पर बच्चों को कम उम्र में दी जा रही टॉयलेट ट्रेनिंग भी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार 24 महीने की उम्र तक ऐसा न करें।
- बीमार रहने और दवाओं के असर, खानपान में अचानक बदलाव और लोकल पर्यावरण से भी यह परेशानी हो सकती हैं।
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इन बातों का रखा ध्यान
- 24 महीने तक उन्हें टॉयलेट ट्रेनिंग न दें।
- 3-4 साल की उम्र में भी समय और जरूरत के अनुसार यह सब सिखाएं।
- एक ही व्यक्ति उन्हें एक ही रूटीन से टॉयलेट ट्रेनिंग दे।
- खाना खाने के पांच मिनट बाद उन्हें यह करवा सकते हैं।
- नित्यकर्म के लिए हमेशा एक ही शब्द जेसे ‘पू’ या ‘पॉटी’ का उपयोग करें।
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अनाज, फल और सब्जियां जरूर खिलाएं
बच्चे के रोजाना प्रति किलोग्राम भोजन में 0.5 ग्राम हिस्सा फाइबर का चाहिए होता है। उसके भोजन में फाइबर की मौजूदगी सुनिश्चित करें, अनाज, साबुत दाल, सब्जियां, सलाद और खासतौर से फल शामिल करें। छह महीने से बड़े नवजात बच्चों का संपूर्ण आहर दूध ही न हो हल्का ठोस भोजन भी दें। पानी उचित मात्रा में पीने की आदत डालें।
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चार हफ्ते से ज्यादा कब्ज रहे तो डॉक्टर को दिखाएं
कब्ज यानी सामान्य नित्यकर्म में मुश्किल आना। अगर यह चार हफ्ते से अधिक रहे तो इसे बेहद गंभीर माना जाता है, जिसमें चिकित्सकीय सहायता की जरूरत होती है। पश्चिमी देशों द्वारा हफ्ते में दो दफा से कम नित्यकर्म के लिए जाना एक लक्षण माना गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय बच्चों में इस लक्षण से फंक्शनल कॉन्स्टीपेशन पकड़ना मुश्किल है।
ऐसे में सुझाव दिया गया है कि दो वर्ष से अधिक उम्र के ऐसे में बच्चे जो दिन में एक दफा से कम नित्यकर्म के लिए जा पा रहे हैं, उन्हें चिकित्सकों को दिखाने की जरूरत है। तीन महीने से अधिक समय अगर यही हालात बने रहें तो जल्द से जल्द बाल रोग गैस्ट्रोइंट्रोलॉजिस्ट को दिखाने की जरूरत है।