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प्राकृतिक रंगों और गुलाल से त्वचा में आता है निखार, जानें- होली का वैज्ञानिक महत्व

Thu, 01 Mar 2018 12:35 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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- फोटो : amar ujala
होली पर्व मनाने के पीछे भले ही पौराणिक कथाओं के अनुसार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हो, लेकिन इसे मनाने का वैज्ञानिक महत्व भी है। इनको जानना बहुत आवश्यक है। वैज्ञानिकों की माने तो होली का त्योहार ऐसे समय में मनाया जाता है जब मौसम अपना कलेवर बदलता है।

मौसम ठंडे से गर्म होने लगता है। ऐसे में शरीर में थकान और सुस्ती महसूस होने लगती है। नसों में ढीलापन आने से खून का प्रवाह हल्का पड़ जाता है और शरीर आलसी हो जाता है। इसे दूर भगाने के लिए लोग फाग के इस मौसम में धूमधाम से होली मनाते हैं और होली की मस्ती में गाना-बजाना और जोर से बोलने से सुस्ती दूर हो जाती है।
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महानिदेशक, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज व अध्यक्ष, वैदिक विज्ञान केंद्र, लखनऊ प्रो. भरत राज सिंह ने बताया कि मौसमी बदलाव के चलते शरीर की सुस्ती दूर करने के लिए इस मौसम में संगीत को भी बेहद तेज बजाया जाता है, जिससे भी मानवीय शरीर को नई ऊर्जा प्रदान होती हैं। इसके अलावा रंग और अबीर जब शरीर पर डाला जाता है तो उसका शरीर पर अनोखा प्रभाव होता है। जब शरीर पर ढाक के फूलों से तैयार किया गया रंगीन पानी, विशुद्ध रूप में अबीर और गुलाल डालते है तो शरीर पर इसका सुकून देने वाला प्रभाव पड़ता है। यह शरीर को ताजगी प्रदान करता है। जीव वैज्ञानिकों का मानना है कि गुलाल या अबीर शरीर की त्वचा को उत्तेजित करते हैं और त्वचा के छिद्रों (पोरों) में समा जाते हैं और शरीर के आभा मंडल को मजबूती प्रदान करने के साथ ही स्वास्थ्य को बेहतर करते हैं और उसकी सुंदरता में निखार लाते हैं।
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होलिका दहन से होता है बैक्टीरिया का नाश
प्रो. सिंह के अनुसार होलिका दहल का भी वैज्ञानिक महत्व है। शरद ऋतु की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन का यह काल पर्यावरण और शरीर में बैक्टीरिया की वृद्धि करता है, लेकिन जब होलिका जलाई जाती है तो उसकी तपन से तापमान (150-170 डिग्री फॉरेनहाइट) बढ़ जाता है। परंपरा के अनुसार जब लोग जलती होलिका में लौंग, इलायची, गरी, अबीर-गुलाल आदि डालकर परिक्रमा करते हैं तो होलिका से निकलने वाला ताप शरीर और आसपास के पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को नष्ट कर देता है और इस प्रकार यह शरीर तथा पर्यावरण को स्वच्छता प्रदान करता है। कई जगह होलिका की राख को माथे पर भभूति के तौर पर लगाते हैं और अच्छे स्वास्थ्य के लिए चंदन, हरी कोपलों और आम के बोर का सेवन करते हैं। दक्षिण भारत में होली अच्छे स्वास्थ्य के प्रोत्साहन के लिए मनाई जाती है।

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ये बरतें सावधानी
- कभी-कभी किसी रंग विशेष के केमिकल के असर से लोगों के शरीर पर कई बीमारियों को जन्म होता है और जिसका इलाज उस रंग विशेष को बेअसर करके ही किया जा सकता है। अत: बाजारू रंग का उपयोग नहीं करना चाहिए ।

- रंग खेलने से पूर्व और बाद में उबटन का प्रयोग करना चाहिए। यह हमारी परंपरा है। इससे रंग के विषाक्त केमिकल का असर शून्य हो जाता है और रंग भी नहाते समय आसानी से छूट जाता है।

- उबटन के प्रयोग से बैक्टीरिया का भी असर समाप्त हो जाता है ।
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लोक मान्यता के अनुसार
- पं. कृष्णकांत के मुताबिक जिस प्रकार दीपावली में दीयों की गर्मी और तेल की गंध से चातुर्मास्य के इकट्ठा हुए कीटाणुओं का नाश होता है, उसी प्रकार शीतकाल में संचित कीटाणुओं का नाश होलिका जलने से होता है। गाना, हंसना और तेज आवाज में बोलने से गले का एक प्रकार से व्यायाम होता है तो गुलाल-अबीर आदि का गले में जाना फेफड़ों व गलें में अवरुद्ध कफ की निवृत्ति में उपयोगी माना जाता है।

- यदि कोई लगातार बीमार रहता है तो होली दहन के समय देशी घी में दो लौंग, एक बताशा, एक पान का पत्ता इन सभी वस्तुओं को होली जलने वाली आग में डाल दें। अगले दिन होली की राख रोगी के शरीर में लगाएं और तत्पश्चात गर्म जल से स्नान कराएं। इस उपाय से रोगी शीघ्र ही स्वस्थ होने लगेगा।`
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