प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की फेयरवेल पार्टी में राहुल गांधी की गैरमौजूदगी चर्चा में बनी रही। जानकारों का कहना है कि राहुल का भीड़-भाड़, मीडिया और लोगों से इस तरह परहेज करना स्वाभाविक ही है क्योंकि देखा जाए तो राहुल ने सही मायने में इस बार ही चुनाव लड़ा है।
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राहुल गांधी ने कैसे लड़ा अपना पहला युद्ध...
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राहुल को इस बार न भाजपा की प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने उनके गढ़ में ललकारा बल्कि 'आप' के विश्वास ने भी राहुल को बेचैन कर दिया।
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अपने ही घर में विरोधियों से मिल रही कड़ी टक्कर और देश में भाजपा की मोदी लहर ने राहुल को इस कदर परेशान किया कि वह आखिरी चरण तक चुनाव प्रचार करते रहे।
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राहुल के मन में यह तक डर बैठ गया कि उनके हाथ से उनका घर 'अमेठी' तक छिन सकता है। वह चुनाव के आखिरी चरण तक इसी डर से जूझते नजर आए।
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राहुल लोगों के बीच पहुंचे, खुद को लोगों से जोड़ने के लिए उन्होंने सभाएं की, उनके साथ चाय पी।
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राहुल पोलिंग के दिन तक अमेठी में हर एक बूथ के दौरे पर निकले, शायद उन्हें भी अंदाजा हो चला था कि इस बार जनता कुछ और फैसला सुना सकती है।
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राहुल के हर चुनावी अभियान में कहीं न कहीं यह बात साफ दिखी कि उन्हें भी मोदी लहर से फर्क पड़ने लगा है।