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पहले भी उठे हैं पुलिस मुठभेड़ों पर सवाल, कई मामलों में पुलिसवालों को हो चुकी है सजा

Fri, 10 Jul 2020 10:08 PM IST
Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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vikas dubey - फोटो : अमर उजाला
पुलिस की मुठभेड़ पर यह कोई पहली बार सवाल नहीं उठ रहे हैं। पहले भी कई मामलों में पुलिस को अपनी मुठभेड़ों को लेकर कठघरे में खड़ा होना पड़ा है। ऐसे ही कुछ मामलों में पुलिसकर्मियों को अदालत ने सजा भी सुनाई हुई है। 

चाहे वह पीलीभीत में एक साथ 11 सिखों को मुठभेड़ के नाम पर मारे जाने का मामला हो, बरेली में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव को मारा जाना हो, झांसी या नोएडा में हुई मुठभेड़ हो। कई मामले चर्चा में रहे और इनमें पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे। किसी मामले की सीबीआई जांच हुई तो किसी मामले में सीबी सीआईडी ने जांच की। ज्यादातर मामलों में पुलिस पर लगे आरोप सही पाए गए। इनमें से कई मामलों में सामने आया कि मुठभेड़ वरिष्ठ अधिकारियों के इशारे पर की गई।
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : amar ujala
इतना ही नहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी माना है कि पुलिस मुठभेड़ों को लेकर आने वाली शिकायतों में यूपी देश में आंध्र प्रदेश के बाद दूसरे नंबर है। आयोग ने इनमें से कई मामलों में पीड़ित परिजनों को हर्जाना भी दिलाया है। जिन पीड़ितों को आयोग ने हर्जाना दिलाया उनमें बदायूं के ब्रिजपाल शाक्य, बुलंदशहर के कुलदीप सिंह, मथुरा के सलीम, लखनऊ की कुरैशा बेगम, शमा परवीन व शहीन जहां आदि शामिल हैं। 
 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
आयोग के निर्देश पर इन सभी को पांच-पांच लाख की राशि दी गई। पीलीभीत में तो पुलिस ने 1991 में एक साथ 11 सिखों को मुठभेड़ में मार दिया था। इस कांड को लेकर सियासी सरगर्मी बढ़ गई थी। विपखी दलों समेत स्थानीय लोगों के विरोध के बाद मामले की सीबीआई जांच बैठाई जा सकी थी। इस मामले में सीबीआई कोर्ट ने 47 पुलिसकर्मियों को दोषी माना था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा तक सुनाई थी।  

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सांकेतिक चित्र - फोटो : Social Media
बरेली में 2007 में पुलिस ने मुकुल गुप्ता नाम के युवक को मुठभेड़ में मारने का दावा किया था। इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश हाईकोर्ट ने दिए थे। मामले की पैरवी कर रहे मुकुल के वृद्ध मां व पिता की कुछ वर्षों बाद 2015 में उनके घर पर हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जांच में एक आईपीएस समेत कुल नौ पुलिस कर्मी दोषी पाए गए। सीबीआई ने इन सभी से पूछताछ की है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर
बिजनौर में 1992 में जसविंदर सिंह की, झांसी में अक्तूबर 2019 में पुष्पेंद्र यादव की, नैदा में 2017 में सुमित गुर्जर की और 2018 में जितेंद्र यादव की पुलिस मुठभेड़ में मौत होने पर कई सवाल उठे। ऐसे ही प्रयागराज समेत कुछ अन्य जिलों में हुए पुलिस एनकाउंटर पर भी सवाल उठ चुके हैं।
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