अश्कों का सफर है कि मुकम्मल नही होता। शब्बीर का गम आंखों से ओझल नही होता। मातम कोई दुनियां में मुसलसल नही होता।
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मातम के बीच निकला चेहल्लुम का जुलूस, तस्वीरें
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बस एक गम-ए-शब्बीर मुअत्तल नही होता, जैसे नौहो और या हुसैन, या हुसैन की सदाओं के बीच हजरत इमाम हुसैन सहित कर्बला के शहीदों के चेहल्लुम का जुलूस गुरुवार को पूरी अकीदत व एहतेराम से निकाला गया।
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जुलूस को शांतिपूर्ण निपटाने के लिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गए थे।
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ये जुलूस नाजिम साहब के इमामबाड़े से निकलकर नक्खास चौराहा, टूरियागंज, हैदरगंज, बुलाकी अड्डा, एवरेडी चौराहा होते हुए तालकटोरा में संपन्न हुआ।
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जुलूस में काली लिबास पहने अकीदतमंद नंगे पांव सीनाजनी करते हुए इमाम हुसैन को याद कर रहे थे।
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जुलूस में सबसे आगे अंजुमन अब्बासिया इमामिया अपने अलम के साथ नौहाख्वानी व सीनाजनी करती हुई चल रही थी।
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इनके पीछे कर्बला के शहीदों का शबीह-ए-ताबूत और ऊंटों पर अमारियां मौजूद थीं। इसके अलावा जुलूस में हजरत अब्बास की निशानी अलम, हजरत इमाम हुसैन के छ: माह के बेटे हजरत अली असगर का गहवारा (झूला) और हजरत इमाम हुसैन की सवारी का प्रतीक जुलजनाह भी साथ-साथ चल रहा था। अजादारों ने इन तबर्रुकात की जियारत कर दुआएं मांगी।
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जुलूस का एक दृश्य।
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जुलूस से पहले नाजिमसाहब के इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन हुआ। मजलिस को इमाम-ए-जुमा मौलाना सैयद कल्बे जव्वाद नकवी ने खिताब करते हुए कहा कि कर्बला का वाकिया सब्र की निशानी है।
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उन्होंने कहा कि हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में तमाम मुसीबतों के बावजूद सब्र का दामन नही छोड़ा। मौलाना ने दुनियां में बढ़ती दहशतगदीं पर चिंता जताते हुए कहा कि अब भारत को भी धमकियां मिल रही है, ऐसे में मुसलमानों को मुत्तहद होकर इसका मुकाबला करना होगा।
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उन्होंने वक्फ संपत्तियों को बेचे जाने के लिए बोर्ड और सरकार को जिम्मेदार ठहराया। जुलूस के कर्बला तालकटोरा पहुंचने पर अलविदाई मजलिस का आयोजन किया गया।