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महिलाओं ने अखाड़े में ठोकी ताल, एक-दूसरे को दी पटकनी, देखें तस्वीरें

Sun, 30 Jul 2017 12:39 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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अखाड़े में ताल ठोक कर ललकारती महिला पहलवान। मैदान के बाहर ढोल मंजीरों के साथ हौसला बढ़ाती 14 गांवों से आई महिलाओं का समूह। उधर, अखाड़े में किसी ने पैर फंसाकर प्रतिद्वंद्वी को चित किया तो किसी ने कुछ ही सेकंड में पटखनी देकर बाजी अपने नाम कर ली।
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दांव-पेच के साथ जीत हासिल का जज्बा और इसके लिए की गई जोर आजमाइश देख पूरा अखाड़ा तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। यह नजारा था गोसाईगंज के छोटे से गांव अहिमामऊ में 200 साल पुराने महिलाओं के दंगल ‘हापा’ का, जहां सैकड़ों साल से देवी शक्ति में अखंड विश्वास रखने वाला यह गांव रविवार नारी सशक्तीकरण का गवाह बना।
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दंगल की शुरुआत ढोल-नगाड़े के बीच देवी गीत से की गई। दंगल का पहला मुकाबला 40 वर्षों से जीत हासिल कर रही बुजुर्ग विनय कुमारी व 75 बसंत पार कर चुकी बुजुर्ग महिला तुलसा देवी के बीच हुआ। अखाड़े में 70 साल की अपराजेय विनय कुमारी ताल ठोक कर चुनौती दे रहीं थीं तो तुलसा देवी भी ललकार रही थी। मैदान के आसपास का माहौल जोश से भरा था।

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विनय कुमारी ने महज कुछ सेकंड में ही तुलसा देवी के पैर में पैर फंसा कर जमीन पर चित कर दिया। महिलाओं का यह 200 साल पुराना दंगल देखने 14 गांवों से आईं महिलाएं नजारा देख उछल गईं। ‘हापा’ में महिला पहलवानों का उत्साह बढ़ाने के लिए बाराबंकी, सीतापुर समेत कई जनपदों से भी बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंची थीं।
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न कोई तकनीक न नियम, बिना गुरु ही सीखती हैं सारे पैतरे
तकनीक की बात की जाए, तो यहां कुश्ती के किसी भी नियम का पालन नहीं होता है। बस, जिसने पहले प्रतिद्वंद्वी की पीठ को मिट्टी से छुआ दिया, वहीं विजेता कहलाया। इस गांव की खासियत यह है कि बीते दो सौ साल से जारी इस दंगल को सिखाने के लिए कोई गुरु नहीं होता। यहां की महिलाएं दंगल के दांव-पेच अपनी अजिया सास, सास व अन्य बुजुर्गों से ही सीखती हैं, लेकिन यह पैंतरे इतने सटीक होते हैं कि गांव की 70 से 75 साल की बुजुर्ग महिलाओं के सामने कोई भी प्रतिद्वंद्वी ज्यादा देर नहीं टिकता।
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महिलाओं के ही जिम्मे थी सुरक्षा व्यवस्था
‘हापा कुश्ती’ के नाम से चर्चित इस दंगल में पुरुषों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित होता है और महिलाएं सामान्य परिवेश में एक-दूसरे से जोर आजमाइश करती है। दिलचस्प बात यह है कि इन मुकाबलों के दौरान रेफरी से लेकर निर्णायक मंडल की भूमिका क्षेत्र की अनुभवी महिलाओं को दी जाती है। सुरक्षा व्यवस्था तक का पूरा जिम्मा महिलाओं के हाथ में था।
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इन्होंने जीते मुकाबले
तकरीबन दो घंटे तक चले दंगल के दौरान ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच कई जोड़ों में मुकाबले हुए। विजेताओं को जहां साड़ी के साथ इनाम में 211 रुपए दिए गए, वहीं प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाने के लिए उपहार के तौर पर 151 रुपये का सांत्वना पुरस्कार भी बांटा गया।
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विलुप्त होने की कगार पर वर्षों पुरानी परंपरा
200 साल पुरानी महिला दंगल ‘हापा’ की परंपरा महज एक खेल नहीं बल्कि महिलाओं की दयनीय स्थिति सुधारने का एक प्रयास है। उस समय जब समाज में महिलाओं की स्थिति बेहद खराब थी तब मौजूदा बेगम नूरजहां ने महिलाओं को शारीरिक तौर से सशक्त करने के लिए दंगल की शुरुआत की थी। इस पूरी रियासत की महिलाओं को इसके लिए विशेष ट्रेनिंग भी दी जाती थी, लेकिन अब महिला सशक्तीकरण की यह कोशिश महज एक परंपरा बन कर रह गई है। सैकड़ों साल पुराना यह महिला दंगल समाप्त होने के कगार पर है। इसके लिए ग्रामीणों के पास अब कोई स्थायी अखाड़ा तक नहीं बचा है। हालांकि ग्राम प्रधान निशा सिंह ने कई बार इसके लिए सरकार से अर्जी दी है, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई।
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