केंद्र सरकार की ओर से कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले के बाद से यूं तो पूरे देश में खुशी की लहर है लेकिन यह फैसला निर्वासित कश्मीरियों के लिए सबसे खास है। आतंकियों की वजह से अपना घर, जमीनें और व्यवसाय छोड़कर वहां से आने को मजबूर हुए कश्मीरियों की खुशी का ठिकाना नहीं है। दशकों बाद एक बार फिर से उन्हें अपने पूर्वजों के घर वापसी की उम्मीद बंधी है। राजधानी में रह रहे तकरीबन ढाई सौ कश्मीरी परिवारों में इस समय जश्न का माहौल है और वे अपने पुश्तैनी गांवों में लौटने की योजना बना रहे हैं। कश्मीरी परिवारों में जश्न जारी है। मंगलवार को भी कश्मीरी परिवारों के यहां खुशी का माहौल रहा। अमर उजाला से बातचीत में इन परिवारों ने साझा कीं अपनी खुशियां।
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डीके रैना और उनका परिवार
- फोटो : अमर उजाला
29 साल से दिल में दबी थी घर वापसी की ख्वाहिश
कश्मीर का माहौल जब रहने लायक नहीं बचा तो 19 जनवरी 1990 को हम चार परिवार ट्रक में बैठकर रातों-रात कश्मीर से बाहर आ गए। हमारे ट्रक के आगे और पीछे सेना का एक-एक ट्रक चल रहा था। उम्मीद थी कि माहौल सुधरेगा तो 10-15 दिन में हम लोग वापस आ जाएंगे। 29 साल हो गए पर 15 दिन में घर लौटने की ख्वाहिश दिल में आज भी दबी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की कोशिशों से यह ख्वाहिश अब पूरी होती दिख रही है। राजधानी निवासी डीके रैना ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद कुछ इस तरह से अपनी खुशी जाहिर की।
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डीके रैना और उनका परिवार
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जम्मू-कश्मीर में राजनैतिक माहौल बदला तो डीके रैना ने भावुक होते हुए अमर उजाला के साथ अपने मन की बात साझा की। उन्होंने बताया कि कश्मीर के हालात बेहद खराब हो चुके थे। दंगे और हमलों के बीच परिवार की सुरक्षा खतरे में लग रही थी। ऐसे में पलायन मजबूरी थी। हमारा घर हब्बा कदल में था। हमारे परिवार के साथ ही साले रोशन कौल और रवि कौल, साली अंजलि कौल और हमारे एक पड़ोसी ने वहां से निकलने की योजना बनाई। उम्मीद थी कि जल्द ही घर लौट आएंगे। इसलिए साथ में सिर्फ मामूली सामान तथा कंबल रजाई ली। हमारे साले का घर थोड़ा दूर था तो वे रात में सिर पर रजाई रखकर कई किलोमीटर का सफर तय करके ट्रक के पास पहुंचे। सेना ने हमें बनियल तक पहुुंचा दिया। इसके बाद हमारे परिवार ने कुछ दिन टेंट में गुजारे। इसके बाद एक-एक कमरा लेकर हम लोगों ने गुजर बसर किया। कमरे में इतनी जगह हुआ करती थी जिसमें हम मुश्किल से लेट सकते थे।
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डीके रैना और उनका परिवार
- फोटो : अमर उजाला
डीके रैना बताते हैं कि हालात सुधरने के बाद दो तीन बार अपने घर तक गया। घर तो गिर चुका है और सामान चोरी हो चुका था और माहौल इतना खराब था कि कुछ मिनट ठहरना भी मुश्किल था। वहां पर विस्थापित हिंदुओं के मकानों पर अघोषित सा कब्जा हो चुका है। अब उम्मीद है कि वहां के हालात सुधरेंगे। इसके बाद सबसे पहले वहां हम अपना घर बनवाएंगे। इसके बाद कोशिश होगी कि अपनी सरजमीं पर जाकर बस सकें।
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खुशी का इजहार करता डॉ आयुष का परिवार
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‘कश्मीर जाकर अब लगेगा की भारत में हैं’
पापा एमईएस में थे। इसलिए हम लोगों को पूरा भारत घूमने का मौका मिला। उनके साथ जम्मू-कश्मीर में भी रही। उनके दिल में कश्मीर बसता है इसलिए उन्होंने श्रीनगर में ही घर बनवा लिया। उनके पास हर साल जाती हूं, पर दिल में डर सा लगता है। लगता है कि भारत में नहीं बल्कि पाकिस्तान में हूं। केंद्र सरकार ने धारा 370 समाप्त कर दिया है। अब वहां जाकर लगेगा कि हम भारत में ही हैं। यह कहना है दंत सर्जन डॉ. आयुष राजदान का।
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खुशी का इजहार करता डॉ आयुष का परिवार
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डॉ. आयुष राजदान के अनुसार कश्मीर में भी सिर्फ 10 फीसदी लोग ही ऐसे हैं जो चाहते हैं कि धारा-370 कायम रहे। कुछ परिवारों ने वहां का विकास रोक रखा है। आलम यह है कि जब हम वहां जाते हैं तो फिर बर्फ पर फिसलने वाली स्लेज तो होती हैं लेकिन वे टूटे हुए और रस्सियां कम से कम तीन जगह से जोड़ी हुई होती हैं। यह वहां की गरीबी है। धारा-370 समाप्त होने के बाद वहां की जनता को विकास के दर्शन होंगे। लोग वहां जाएंगे तो बाहरी संपर्क बनेगा और हमारा कश्मीर विश्व के साथ कदम मिलाकर चल सकेगा। इस साहसिक कदम के लिए हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एहसानमंद हैं। अब वास्तव में अखंड भारत का निर्माण हुआ है।
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रैना परिवार
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आतंकियों ने दी थी धमकी, बेटे कश्मीर आएंगे तो गोली मार देंगे
कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाए जाने से महानगर का रैना (पंडित) परिवार बहुत खुश है। इस परिवार के मुखिया दिवंगत माखल लाल रैना को वर्ष 1960 में कश्मीर छोड़ना पड़ा था। लेकिन माखन लाल की बहन व भांजे आज भी आतंकी इलाके पुलवामा मेें रहते हैं। माखन लाल के बेटे बिल्लू रैना जो कि भूतनाथ मार्केट के बड़े कारोबारी व प्रेस्टीज कूकर के शोरूम मालिक हैं, ने बताया कि उनके पिता का इस वर्ष मार्च में निधन हो गया। चाचा नंदलाल पंडित रेलवे से रिटायर हैं। बिल्लू कहते हैं कि आठ सदस्यीय परिवार में बड़े भाई राकेश रैना, पत्नी व दो बच्चे लखनऊ में रहते हैं। मेरी ससुराल अनंतनाग जिले में है। पत्नी व दो बच्चाें ने अब तक पैतृक आवास को नहीं देखा है। जमीन व घर की देखरेख बुआ का बेटा कमलेश कर रहा है। कमलेश वहां भौतिक विज्ञान का प्रवक्ता है। पिता उनसे मिलने जाते रहे, लेकिन वर्ष 2012 में आतंकवादियों ने धमकी दी थी कि बेटे गांव आएंगे तो जान से मार देंगे।
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रैना परिवार
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पैतृक गांव देखने जाएंगे
बिल्लू रैना ने प्रधानमंत्री व गृह मंत्री के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाकर उपकार किया है। अब तो उनकी पत्नी, बेटे, भाई, भतीजे पैतृक गांव देखने जाएंगे। उनके लिए कश्मीर का हमारा पैतृक गांव केवल एक कहानी ही था। चचेरे भाई कमलेश से मोबाइल पर बातचीत की और खुशी का इजहार किया।
72 साल पहले कश्मीर से लखनऊ आए पूरन प्रकाश के परिवारीजन
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72 साल बाद पूरा होगा पुश्तैनी घर देखने का सपना
72 साल पहले बंटवारे के समय 1947 में हुए दंगों के बाद पूरा परिवार दंगाइयों से घिर गया था। पिताजी बताते हैं कि तब वह 24 साल के थे और पूरा परिवार बारामूला के बर्बरशां इलाके में रहता था। बमुश्किल पिता जी परिवार के सदस्यों को बचा कर कश्मीर में अपना सब कुछ छोड़कर निकल पाए। इसके बाद उन्होंने लखनऊ में अपने एक रिश्तेदार के यहां पनाह लेकर पढ़ाई पूरी की। सिविल एविएशन में करियर बनाते हुए पायलट की नौकरी कर लखनऊ में ही बस गए।
हम तीनों भाइयों का जन्म लखनऊ में हुआ और यहीं शिक्षा प्राप्त कर करियर बनाया लेकिन सभी के दिल में कश्मीर में अपने पूर्वजों का पुश्तैनी घर देखने की इच्छा लगातार बनी रही। मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के ऐतिहासिक फैसले से अब अपने पूर्वजों की जमीन व पुश्तैनी घर देखने का सपना पूरा होगा। हम तीनों भाई स्थिति सामान्य होते ही एक साथ पुश्तैनी घर को देखने बारामूला जाएंगे और सब कुछ अनुकूल रहने पर हर संभव स्तर पर पुराने पुश्तैनी घर को खरीदकर इसे पाने का सपना पूरा करेंगे। -पवन, असीम, विशाल पिता पूरन प्रकाश टिक्कू के साथ