भले ही सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय से श्रीराम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव बाद करने की मांग की हो, पर उनके तर्क से बहुत लोग सहमत नहीं हैं। कुछ की राय है कि फैसले में देरी से कोई दिक्कत नहीं है। तो कुछ जल्द फैसला चाहते हैं। पर, सबकी इच्छा यही है कि जो भी हो, अदालत को इस मामले में फैसला कर ही दे।
खास बात यह भी है कि फैसले के मुद्दे पर शिया या सुन्नी के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं दिखती। कुछ सुन्नी विद्वान और धर्मगुरु चाहते हैं कि मामले में फैसला आ ही जाना चाहिए। बहुत विलंब हो चुका। अब और विलंब ठीक नहीं है। न्यायालय जब भी सुनवाई करे तो अब वह टले नहीं।
शिया वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी के अयोध्या में जल्द से जल्द मंदिर निर्माण के पक्ष में होने के बावजूद उधर शिया धर्मगुरु अदालत के फैसला मानने की बात कहते हैं। प्रमुख शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे सादिक की राय है कि प्राथमिकता अमन-चैन को दिया जाना चाहिए। इस मामले में कोई खून-खराबा नहीं होना चाहिए। मंदिर या मस्जिद का फैसला कब होता है या कैसे होता है, इसका कोई बहुत मतलब नहीं है।
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विवाद खत्म होना जरूरी
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ के उर्दू विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. असलम जमशेदपुरी का कहना है कि अब विवाद खत्म होना चाहिए। कुछ लोग इस मामले को लटका कर रखना चाहते हैं। इस पर सियासत करना चाहते हैं। एक आम आदमी के नजरिए से मेरी इच्छा है कि इस पर सियासत नहीं होनी चाहिए। मामले का कोई न कोई नतीजा अब निकल ही आना चाहिए। यह जितनी जल्दी हो जाए उतना ही देश और समाज के लिए ठीक रहेगा।
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सुनवाई शुरू हो तो रुके नहीं
सुन्नी धर्मगुरु एवं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली कहतै है कि काफी कागज हैं। इसलिए उन्हें पढ़ने का दोनों पक्षों को पढ़ने का पूरा मौका देना पूरी तरह ठीक है। अब यह विवाद खत्म होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने 8 फरवरी से सुनवाई शुरू करने को कहा है। मेरी बस यही इच्छा है कि अब जब भी सुनवाई शुरू हो तो उसे फिर रोका न जाए। लगातार सुनवाई हो और फैसला किया जाए।
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फैसला जजों पर छोड़ दें
शिया धर्मगुरु एवं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना डॉ. कल्बे सादिक कहते हैं कि मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि इस विवाद का फैसला जल्द हो या उसमें देरी की जाए। बस किसी का खून नहीं बहना चाहिए। वैसे भी जब कोई मामला न्यायालय में चला जाता है तो यह जज का अधिकार होता है। जज जब सारे बिंदुओं पर गौर कर लेता है, तथ्यों को जांच-परख लेता है, तब फैसला करता है।
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सुनवाई टालने में कोई हर्ज नहीं
सुन्नी धर्मगुरु मौलाना इरफान मियां फिरंगी महली का कहना है कि जिस तरह के हालात हैं उनको देखते हुए सर्वोच्च अदालत का फरवरी से सुनवाई करने का फैसला बिल्कुल ठीक है। अभी हालात बिगड़ सकते थे। सही फैसला करने में वक्त लगता ही है। अदालत को जितना वक्त लेना है, वह ले। इतने पेंचीदे मामले का फैसला जल्दबाजी में नहीं हो सकता। अभी सुनवाई का कुछ सियासी दल फायदा उठा सकते थे।
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जल्दबाजी क्यों करना चाहिए
सुन्नी धर्मगुरु मौलाना जहांगीर आलम कासमी का कहना है कि फैसला जल्दी क्यों आना चाहिए? इतने मुश्किल मामले में जल्दबाजी में फैसला करना ठीक नहीं है। जब इतने वर्ष इंतजार हो सकता है तो कुछ और वर्ष प्रतीक्षा करने में क्या बिगड़ा जा रहा है। भाजपा को ही इस फैसले की ज्यादा जल्दी है। भाजपा साजिश कर रही है। अदालत को फैसला करने में जो भी वक्त लगे, वह लगाए।
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देरी किसी भी तरह ठीक नहीं
शिया धर्मगुरु एवं शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास कहते हैं कि फैसला जल्द से जल्द होना चाहिए ताकि लोगों को सियासी रोटियां सेकने का और मौका न मिले। देश में तमाम मंदिर हैं जहां घंटियां बजाने वाले और पूजा करने वाले नहीं हैं। तमाम मस्जिदें ऐसी पड़ी हैं जहां नमाज पढ़ने वाले नहीं हैं। दुनिया 21वीं सदीं में चल रही है और हम लोग इस विवाद में उलझे हैं। मैं तो यही चाहता हूं कि अब इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। सर्वोच्च अदालत जो भी फैसला दें उसे सभी को स्वीकार कर लेना चाहिए।
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मामला लटकाना किसी के हित में नहीं
शिया धर्मगुरु एवं चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सभी को मानना चाहिए। इस संवेदनशील मुद्दे को ज्यादा लटकाना किसी के हित में नहीं है। ढांचा ढहना अफसोसजनक था। पर, अब सभी को बीते हुए कल को याद करने के बजाय आगे की ओर देखना होगा। मेरा न्यायालय से गुजारिश है कि इस मामले पर लगातार सुनवाई करके फैसला दे दे और उसे सभी पक्ष स्वीकार करें।
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मामले के लटकने से बहुत नुकसान हो चुका
शिया पीजी कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर एस. तकी अपना पक्ष रखते हैं कि इस मामले को टालने की कोशिशों को समर्थन नहीं मिलना चाहिए। लंबे अरसे से इसके लटके होने के कारण पहले ही समाज का बहुत नुकसान हो चुका है। फैसला जो भी हो, जल्द हो। न्यायालय ने ठीक ही कहा कि वह अब जब फरवरी में सुनवाई शुरू करेगा तो टालेगा नहीं, यह ठीक है। सभी को बहुत मौका मिल चुका। अब मामले का निपटारा जरूरी है।
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न्याय मिलना ही नहीं, होते हुए भी दिखना चाहिए
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. मोहम्मद सज्जाद ने कहा, मेरी एक नागरिक की हैसियत से यह चिंता है कि 6 दिसंबर 1992 को संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले को अभी तक सजा नहीं दी गई। ढांचा ढहाने के आरोपियों को हम निर्वाचित कर उच्च पदों पर बैठाकर अपना शासक बना ले रहे हैं। पाकिस्तान का तो निर्माण ही राष्ट्रवाद के ऐसे सिद्धांत पर हुआ है कि उसमें धर्मांधता निहित है। वह साम्राज्यवादी ताकतों की कठपुतली है। फिर भी वहां के मतदाता को जब भी मत डालने का अवसर मिलता है, वह ऐसे अतिवादियों को पदासीन नहीं करता, जैसों को हम करते हैं। ऐसे में चिंता यह है कि हम कैसे राष्ट्र और समाज का निर्माण कर रहे हैं। न्याय मिलना ही नहीं होते हुए दिखना भी चाहिए। मेरा एक सवाल है कि ढांचा ढहाने के आरोपियों पर तो मुकदमा चलने लगा लेकिन इस घटना के मद्देनजर फैली हिंसा के दोषियों पर कार्रवाई कब होगी? श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट ज्यों की त्यों पड़ी हुई है। हिंसा में तबाह लोगों के परिवार अब भी भोग रहे हैं लेकिन आरोपी आजाद घूम रहे हैं।
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हिंदू पक्षकार भी मामला टालने के खिलाफ, कहा- सिब्बल की अर्जी बेबुनियाद
कपिल सिब्बल की अर्जी बेबुनियाद है। चुनाव से राममंदिर मसले का क्या लेना-देना है? अयोध्या मामले में अब राजनीति बंद होनी चाहिए। मंदिर का मामला करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा है। इस मामले का समाधान जल्द से जल्द हो जाना चाहिए। राम के कार्य में रोड़ा डालना अनुचित है। आपसी समझौते से अयोध्या मामले के समाधान का सवाल है, श्रीश्री रविशंकर का इस मसले पर प्रयास सराहनीय है, उन्हें सफलता मिल सकती है।
-महंत द्विनेन्द्र दास, निर्मोही अखाड़ा
मामले को लटकाना चाहती है कांग्रेस
कपिल सिब्बल कांग्रेस के नेता हैं। ऐसा लगता है कि कांग्रेस मामले को लटकाना चाहती है। मुस्लिम पक्ष के वकील भी कपिल सिब्बल हैं । इससे लगता है मुस्लिम पक्ष भी अयोध्या मामले का शीघ्र समाधान नहीं चाहता। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है। किसी के रोड़ा डालने से कुछ नहीं होने वाला है। उम्मीद है कि शीघ्र ही हमारे पक्ष में फैसला आएगा।
-महंत धर्मदास, मामले में पक्षकार