परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडे की 16वीं पुण्यतिथि पर आज राजभवन में विशेष कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम में राज्यपाल राम नाईक ने कैप्टन मनोज पांडेय की फोटो पर माल्यार्पण कर उनकी वीरता को याद किया।
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आपको भी रुला देगी शहीद मनोज पांडेय की कहानी
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जिस परमवीर चक्र सम्मान को पाने का सपना संजोकर मनोज सेना में गए थे, वो सोलह साल पहले ठीक आज की तारीख में पूरा हो चुका है। बस फर्क यह है कि मनोज आज हमारे बीच नहीं हैं। हैं तो उस चौबीस साल के शहीद की बहादुरी के किस्से।
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शहीद कैप्टन मनोज पांडेय की पर्सनल डायरी में लिखे शब्द‘मेरा बलिदान सार्थक होने से पहले अगर मौत दस्तक देगी तो संकल्प लेता हूं कि मैं मौत का भी कत्ल कर दूंगा’ पढ़कर ही शरीर के रोएं हरकत में आ जाते हैं।
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मूलरूप से सीतापुर के रुधा गांव में जन्मे मनोज कुमार पांडेय का परिवार आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध नहीं था। मगर मनोज ने कभी इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।
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रानी लक्ष्मीबाई मेमोरियल स्कूल के संस्थापक जयपाल सिंह के मुताबिक मनोज उनकी रहीम नगर शाखा का छात्र रहा है। शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई में उसे बहुत रुचि थी। इसी रुचि को उसने अपनी गरीबी से लड़ने का हथियार बनाया।
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कड़ी मेहनत से वह स्कूल का टॉपर बन गया। एक के बाद एक छात्रवृत्ति परीक्षाएं उत्तीर्ण करते हुए आखिर में उसने अखिल भारतीय स्तर की छात्रवृत्ति परीक्षा पास करके सैनिक स्कूल में दाखिला लिया।
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वह आईआईटी और एनडीए दोनों में अच्छे नंबरों से पास हुए। मगर यहां उसने जिद करके एनडीए में दाखिला लिया। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह बतौर कमीशंड ऑफिसर ग्यारहवां गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन में पहुँच गए। उनकी तैनाती कश्मीर घाटी में हुई।
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कारगिल युद्ध के दौरान मनोज कुमार पांडेय ने निर्णायक युद्ध के लिए 2-3 जुलाई 1999 को कूच किया,जब उनकी कंपनी को खालूबार फतह करने का जिम्मा सौंपा गया।
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वहां दुश्मन के एक के बाद एक बंकर तबाह करने के बाद चौथे बंकर की ओर उन्होंने एक हैंड ग्रेनेड फेंका। तभी दुश्मन की एक मीडियम मशीन गन से छूटी हुई होली उनके माथे पर लगी।
उनके हाथ से फेंके हुए ग्रेनेड का निशाना अचूक रहा। ग्रेनेड ठीक चौथे बंकर पर लगा और उसे तबाह कर दिया। मगर मनोज कुमार पांडे इसमें शहीद हो गए। मनोज कुमार पांडेय की अगुवाई में की गई इस कार्यवाही में दुश्मन के 11 जवान मारे गए। साथ ही खालूबार भारत की सेना के अधिकार में आ गया था।