शहरवासियों के लिए मेट्रो रोजाना 24 घंटे ड्यूटी करती है ताकि आपको रोजाना मेट्रो साफ-सुथरी और बिना किसी खामी के सुखद सफर करा सके। इसके लिए उसे रोजाना 16 घंटे के कॉमर्शियल रन के अलावा आठ घंटे पायलट टेस्ट से गुजरना पड़ता है। ये आठ घंटे मेट्रो ट्रेनों की मेंटेनेंस और सुरक्षा जांच के अलावा उनकी साफ-सफाई पर खर्च किया जाता है। इस दौरान सभी विभागों के स्टाफ की जिम्मेदारियां तय रहती है।
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इस ड्यूटी में किसी को बनाए गए शिड्यूल से हटने की अनुमति तक नहीं होती है। इसकी वजह यह है कि हर एक काम दूसरे के काम से जुड़ा हुआ है। ...तो जानिए कि कैसे लखनऊ मेट्रो अपनी सेवाएं दे रही है।
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पायलट टेस्ट के बाद भी यात्रियों को बैठाने की अनुमति लखनऊ मेट्रो की रोजाना यात्री सेवा भले ही सुबह छह बजे से शुरू होती हो, लेकिन मेट्रो ट्रेन ऑपरेटर्स और ऑपरेशन कंट्रोल रूम (ओसीसी) का काम सुबह 4:30 बजे से ही शुरू हो जाता है।
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इस दौरान डिपो से पहली ट्रेन को बाहर निकालकर ट्रांसपोर्ट नगर स्टेशन पर ले जाया जाता है। इसके बाद एक खाली ट्रेन का करीब पांच बजे टेस्ट रन कराया जाता है। इस टेस्ट रन में पूरे रूट और सिस्टम की जांच होती है। ओसीसी खुद इसकी निगरानी करता है। ट्रांसपोर्ट नगर से चारबाग के बीच पायलट टेस्ट के बाद ओसीसी के चीफ कंट्रोलर अपना ओके सर्टिफिकेट देते हैं। इसके बाद शुरू होता है यात्रियों को बैठाकर यात्रा कराने का सिलसिला।
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पायलट टेस्ट के बाद शिड्यूल के मुताबिक ट्रेनों का यात्रियों के लिए चलना शुरू हो जाता है। यह सिलसिला रात 10 बजे तक चलता है। इस बीच हर सात मिनट या मांग के मुताबिक ट्रेनों को ट्रांसपोर्ट नगर से चारबाग तक आठ स्टेशनों के बीच अभी 8.5 किमी. में चलाया जाता है। इस बीच ओसीसी और स्टेशन कंट्रोल की टीमें अपने ट्रेन ऑपरेटर्स व दूसरे स्टाफ का काम चलता है। सुरक्षा टीमें भी अपना सहयोग यात्रियों की सुविधा के लिए देती हैं।
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कॉमर्शियल रन खत्म होने के तुरंत बाद ट्रेनें डिपो में जाने लगती हैं। यहां पहले से एक शिड्यूल बना हुआ है। इसमें जिन ट्रेनों को ऑटोमेटिक वाशिंग प्लांट में सफाई के लिए जाना होता है, वहां उनकी सफाई शुरू हो जाती है। इसके अलावा बाकी ट्रेनों को वर्कशॉप में ले जाकर नियमित जांच और मेंटनेंस शुरू कर दी जाती है। यह काम सुबह 4 बजे तक चलता है। इसके बाद दुबारा से ट्रेन अपने पायलट टेस्ट और कॉमर्शियल रन के लिए तैयार हो जाती है।
मेट्रो के एक अधिकारी ने बताया कि पायलट टेस्ट इसलिए होता क्योंकि पूरी रात कॉमर्शियल रन बंद होने के बाद सुबह एक नियमित जांच जरूरी होती है। इससे हम पता कर पाते हैं कि ओएचई, सिग्नल, ट्रैक, टेली कम्युनिकेशन सिस्टम ठीक से काम कर रहा है या नहीं। पायलट टेस्ट के बाद जब तक ओसीसी में बैठे चीफ कंट्रोलर अपनी अनुमति नहीं देंगे, तब तक पहली ट्रेन को रवाना नहीं किया जा सकता है। यह बिल्कुल एयरपोर्ट से हवाई जहाज के उड़ान भरने से पहले एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियर की जांच और फ्लाइट टेक ऑफ की अनुमति जैसा है।