पत्रकार जगेंद्र की हत्या और उसमें अखिलेश सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा पर कथित आरोप, इन आरोपों से घिरी सरकार, कानून व्यवस्था पर विपक्ष के साथ हमलावर राज्यपाल के रुख से शायद अखिलेश सरकार को राहत मिली होगी।
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क्या हो गया पत्रकार जगेंद्र के साथ न्याय?
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पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से शाहजहांपुर में चल रहा पत्रकार जगेंद्र के परिवार का अनशन इन्हीं दृश्यों के साथ खत्म हो गया। जगेंद्र के बेटे और उनके पिता ने लखनऊ आकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ मुलाकात की।
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मुलाकात के पहले राममूर्ति और सरकार के प्रति हमलावार जगेंद्र और उनके शुभचिंतकों के स्वर अचानक ही मृदु हो गए। मुलाकात के बाद निकले जगेंद्र के पिता और उनके बेटे ने कहा कि वह अब वह इस मामले की सीबीआई जांच की मांग बंद कर रहे हैं। उन्हें मुख्यमंत्री के आश्वासन पर विश्वास है।
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इन लोगों ने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री की ओर से जगेंद्र के परिवार को 30 लाख रुपए मुआवजा देने के साथ उनके दोनों बेटों को नौकरी भी मिलेगी।
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सवाल अब यह बचा है कि क्या इसी मुआवजे के साथ पत्रकार जगेंद्र की मौत के बाद न्याय दिलाने के लिए शुरू की गई लड़ाई क्या अधर में छोड़ दी गई है? यह सवाल सोमवार को पूरे दिन पत्रकारों सहित तमाम राजनैतिक दलों और लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा।
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घटना के बाद से जगेंद्र के परिवार के साथ न्याय की लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर शामिल रहे लोग ही अब कह रहे हैं कि जब परिवार ने ही जंग अधूरी छोड़ दी है तो वे क्या कर सकते हैं।
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जगेंद्र के मामले में पूरे देश के पत्रकार संगठन एकजुट होकर लड़ाई को आगे बढ़ाने और परिवार के लोगों को न्याय दिलाने के लिए आगे आए गए। देश भर में धरना प्रदर्शन, आंदोलनों को दौर शुरू हो गया। लेकिन रविवार रात अचानक सारा घटनाक्रम बदल गया।
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जगेंद्र के पिता और छोटा बेटा बिना किसी को जानकारी दिए रात में लखनऊ चले गए और मुख्यमंत्री से मुलाकात की। इसके बाद सहायता राशि, नौकरी और जमीन से कब्जा हटाने की घोषणा हो गई। सवाल उठता है कि क्या जगेंद्र सिंह की ओर से शुरू की गई लड़ाई को अधर में छोड़ दिया गया है?
क्या परिवार की यह लड़ाई इसीलिए लड़ी गई थी कि उन्हें इस तरह का मुआवजा मिल जाए? अब सवाल लोगों के जेहन में उठना लाजिमी है कि क्या जगेंद्र के मसले पर इंसाफ उसी तरह का होगा जिसके लिए यह लड़ाई लड़ी जा रही थी।