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'...और मैं 'जादू' से जावेद अख्तर बन गया'

Tue, 09 Jun 2015 12:39 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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‘न्यू हैदराबाद की जिस सड़क पर रहता था वहां 10-12 घर थे। कुछ कायस्थ परिवार थे, कुछ ठाकुर। 2 मुस्लिम और क्रिश्चियन और कुछ ब्राह्मण थे। बचपन में मुझे ऐसा माहौल मिला कि मुझे कभी होली दूसरे समुदाय का त्यौहार नहीं लगी।

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बचपन का सबसे बड़ा मलाल था कि मुझे पीतल की पिचकारी नहीं मिल पाई। मेरे चचेरे भाई जो मुझसे 20-20 साल बड़े थे, होली पर उनके दोस्त घर में घुस आते और उन्हें खींचकर बाहर ले जाकर रंग देते थे। मोहर्रम होता तो कायस्थ परिवार अपना रेडियो धीमी आवाज में बजाते ताकि मुस्लिम परिवारों को परेशानी न हो। यही लखनऊ है और इसी लखनऊ ने मुझे तैयार किया है।
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मैं अच्छा हूं, बुरा हूं, या जैसा भी हूं आप लखनऊ वालों को जिम्मेदार कहूंगा।’ भारत के जाने माने शायर जावेद अख्तर ने कुछ इन शब्दों में लखनऊ और यहां के लोगों से अपने साथ को समझाया। मौका था गोमतीनगर स्थित जयपुरिया संस्थान में भगवती चरण वर्मा के पौत्र चंद्रशेखर वर्मा के उपन्यास ‘कॉनर्स ऑफ अ स्ट्रेट लाइन’ के विमोचन का।

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लखनऊ एक्सप्रैशंस संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जावेद अख्तर के विचारों और उनकी कविताओं को सुनने बड़ी संख्या में लखनवी उमड़े और जावेद ने भी किसी को निराश नहीं किया।
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कार्यक्रम का शुभारंभ जावेद अख्तर,लखनऊ एक्सप्रैशंस के संस्थापक जयंत कृष्णा और कनक रेखा ने पुस्तक के विमोचन से किया। इस मौके पर लेखक चंद्र शेखर वर्मा ने बताया कि वे अंग्रेजी में खुद को साबित करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इंग्लिश उपन्यास लिखा।

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पुस्तक में उन्होंने एक व्यक्ति की आदर्श साथी की तलाश को दर्शाया है जो अलग-अलग स्वभाव की महिलाओं के साथ अनुभवों से गुजरती हुई अंत पर पहुंचती है। विमोचन कार्यक्रम के बाद जावेद अख्तर और जयंत कृष्णा ने लखनऊ व जावेद के जीवन पर बातें की। जावेद अख्तर ने बताया कि वे ग्वालियर में जन्म और फिर लखनऊ आ गए, यहां 12 वर्ष तक उन्होंने अपना बचपन जिया। इसके बाद गर्मियों की छुट्टियों में मुंबई से यहां आते थे।
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अपने फिल्मी जीवन पर जावेद ने कहा कि वे अब 30 वर्ष पहले फिल्म स्क्रिप्ट लिखने वाले लेखक नहीं रहे, बल्कि एक अलग व्यक्ति बन चुके हैं। जो वे नहीं कर पाए हैं, उसे करना चाहते हैं। लखनऊ को लेकर जावेद ने कहा कि जब आप लखनऊ में रहते हैं तो इसके महत्व को नहीं समझ पाते। लेकिन जब बाहर निकलते हैं तो लखनऊ समझ आता है। वे खुद जब लखनऊ लौटते हैं तो यहां की हवा की खुशबू और मिट्टी के सुनहरेपन को देखकर सुख महसूस करते हैं।

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लखनऊ और तहजीब वैसे ही हैं जैसे समंदर में पानी और आसमान में तारे। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने नागरिकों से भी सीधी बात करते हुए उनके सवालों के जवाब दिए। वहीं जावेद अख्तर ने खुशी जताई कि युवा पीढ़ी में शायरी और गजल को लेकर रुचि है। साथ ही जावेद ने कहा कि दोहों को बचाने की अब जरूरत है। वे बुद्धिमत्ता के कैप्सूल जैसे हैं। आयोजन के अंत में उन्होंने अपनी कुछ कविताएं भी पढ़ीं।

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जादू से बना जावेद’
मिताली ने सवाल किया कि आपका नाम जादू कैसे पड़ा? उन्होंने बताया कि वे ग्वालियर के अस्पताल में पैदा हुए तो उनके पिता से कहा गया कि मुस्लिम रवायत के अनुसार उनके कान में कुछ पढ़ा जाए। पिता कम्युनिटी पार्टी ऑफिस से लौटे थे, हाथ में रखे ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ के कुछ हिस्से मेरे कान में पढ़ डाले।

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जब नाम रखने की बात आई तो उनकी एक गजल ‘लम्हा-लम्हा किसी जादू का अफसाना होगा’ से जादू शब्द निकालकर नाम रख दिया गया, लेकिन जब स्कूल जाने का समय आया तो जादू नाम नहीं चल सकता था, इसलिए पैट नेम को ही बढ़ाकर जादू से जावेद कर दिया गया।

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अच्छा लेखक बनने के लिए पूछे गए सवाल पर जावेद ने कहा कि इसके लिए खूब पढ़ें। क्लासिक साहित्य से लेकर पेपर बैक में छपने वाला साहित्य तक। पोस्ट व प्री-मॉडर्न हो या कोई अनुवाद, सभी पढ़ें। लिखने की जल्दी न करें।

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मैं इसलिए नास्तिक हूं
उनके नास्तिक होने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा मैं नास्तिक नहीं, बल्कि रेश्नलिस्ट शब्द को सही मानूंगा। जावेद ने कहा कि हम एक ड्राइवर या कुक भी रखते हैं तो उससे 10 सवाल करते हैं, पूछताछ करते हैं। लेकिन ईश्वर चुनते समय ऐसा नहीं करते, कुछ तो सवाल होने चाहिए, जैसे वे हमारे लिए क्या करेंगे, हमें क्या करना होगा? हमें क्या मिलेगा आदि। ईश्वर सर्वत्र हैं और सर्वशक्तिमान है, जिसकी मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता, उसके होते दुनिया ऐसी क्यों चल रही है? और उसमें विश्वास करने वालों को उससे शिकायत तक नहीं है?
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बच्चे डिप्थिरिया से मरते हैं, तो गले में जाली बनती है, उसके बाद दम घुटता है। इसमें समय लगता है, अगर कोई है जो इस मौत को रोक सकता है, तो वो क्यों नहीं रोकता? वह क्यों तमाशा देखता है? ऐसे ईश्वर की इबादत मैं तो कभी नहीं करूंगा। अगर वो हैं भी, तो मैं उसे मानने से इनकार करता हूं। अगर कभी उससे सामना हुआ तो वो क्या मुझसे पूछेगा, मैं पूछना चाहूंगा उससे कि भई ये दुनिया को तूने क्या कर रखा है।
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