नवाबी दौर में चमका था
लखनऊ का नसीब
हयात बख्श नूर बख्श कोठियों के समीप
महल भी बाग भी
और मकबरा सिब्तेनाबाद
यूं रफ्ता-रफ्ता हुआ अपना हजरतगंज आबाद
गंज पर लिखी ये पंक्तियां बताती हैं कि वक्त किसी को भी बख्शता नहीं है। रफ्तार को कोई रोक नहीं सकता। लखनऊ की आन-बान और शान हजरतगंज की कहानी भी कुछ ऐसी है। गंज की बदलती रफ्तार का जिक्र फिर यूं आया, जब बुधवार को मेट्रो निर्माण के लिए मेफेयर सिनेमा का बोर्ड उतारा गया। मूल गंज की तस्वीर देखते हुए अब यूं कहने का मन करता है रफ्ता-रफ्ता यूं बदलता गया अपना हजरतगंज।
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कैमरे में कैद करते गंज की यादें
- फोटो : amar ujala
यदि आपको गंज से प्यार है और गंजिंग के किस्से आज भी आपको मुस्कुराने को मजबूर करते हैं तो यहां होने वाले बदलावों से आपका वास्ता है। यहां रहने वाले हर एक शख्श, चाहे उसकी पैदाइश यहां की हो या फिर उसने यहां की नवाबी/ब्रिटिशकालीन फिजां में सांस ली हो, उसे हजरतगंज के अतीत-वर्तमान और भविष्य से सरोकार रखना चाहिए। जिनकी रग-रग में लखनऊ बसा है, यदि उनके नजरिए से देखें तो गंज तो उतना ही है, जितना पहले हुआ करता था। यही कोई कोठी नूर बख्श वर्तमान में जिलाधिकारी आवास से शुरू होते हुए जीपीओ तक। ज्यादा से ज्यादा हयात बख्श कोठी या राजभवन तक। नामकरण के बारे में तो इतिहासकार कहते हैं कि 10वें शासक अमजद अली शाह के समय यह बाजार के तौर पर विकसित हुआ। उनकी धार्मिक प्रवृत्ति के चलते ही उन्हें हजरत पुकारा जाता था और इसी नाम पर इस बाजार का नाम हजरतगंज पड़ गया।
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हजरतगंज
- फोटो : amar ujala
सेहत और मनोरंजन का कॉम्बो
आज गंज चौराहे पर छंगामल का शोरूम खड़ा है, वहां कभी विश्व प्रसिद्ध बेकरी बेन बोज हुआ करती थी। इसकी खासियत यह थी कि यहां ‘न्यूट्रिशियन फूड’ की सौ फीसदी गारंटी होती थी। गंज को यदि सेहत और मनोरंजन का कॉम्बो पैक कहें तो गलत नहीं होगा। ब्रिटिश काल में यहां रेस्टोरेंट, सिनेमा और रिक्रिएशन सेंटर की एक लंबी श्रृंखला हुआ करती थी। शुरुआत प्रिंस और प्लाजा सिनेमा से कर सकते हैं। हालांकि प्रिंस सिनेमा की जगह अब मार्केट बन चुका है और प्लाजा जो कुछ दिनों तक फिल्मिस्तान भी कहलाया, उसने साहू बिल्डिंग का रूप ले लिया है। बसंत सिनेमा के सामने ब्लू हैवन, क्वालिटी रेस्त्रां, प्रिंस थियेटर, कृष्णा रेस्त्रां, रंजना होटल, कपूर होटल और चौधरी स्वीट्स नामचीन ‘ईटिंग पॉइंट्स’ हुआ करते थे। नगर निगम मुख्यालय और भोपाल हाउस के पीछे जहां गुरुद्वारा है, वहां मशहूर रॉक बैंड स्टैंड हॉल था। अंग्रेजों की शामें अक्सर यहां बीता करती थीं। बिलियर्ड्स हो या फिर बॉल रूम डांस, यहां आम था। प्रिंस थियेटर तो बॉलरूम डांस के लिए ही फेमस था। यहां की फर्श को टीक की लकड़ी से बनवाया गया था।
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हजरतगंज
- फोटो : amar ujala
कंकर वाली कोठी से हबीबुल्ला स्टेट तक
देश-विदेश में प्रसिद्ध हबीबुल्लाह स्टेट जहां पर है, वहां कभी लंदन-दिल्ली बैंक हुआ करता था। नवाबी दौर में इस इमारत का इस्तेमाल बतौर गेस्ट हाउस होता था। बाद में यह हबीबुल्ला स्टेट में बदल गया। गंज में यह आवासीय और व्यावसायिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन चुका है। दुर्भाग्यवश इसी इलाके में है कंकर वाली कोठी, जो अब पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। इतिहासकार योगेश प्रवीण बताते हैं कि जिस दौर में यह बनी, तब लखनऊ में स्टोन का इस्तेमाल नहीं होता था, लेकिन इसे स्टोन से ही बनाया गया।
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बेगम कोठी
- फोटो : amar ujala
बेगम कोठी से जनपथ तक
जनपथ मार्केट की रौनक बेगम कोठी की कर्जदार है। इतिहासकार बताते हैं कि अमजद अली शाह की बेगम यहां रहा करती थीं, इसीलिए इसे बेगम कोठी कहते हैं। अंग्रेजों के समय में असली पोस्ट ऑफिस यहीं था। बाद में इस कोठी को तोड़कर यहां जनपथ मार्केट बनाया गया। बहादुर शाह जफर का हत्यारा कैप्टन हैटसन भी यहीं मारा गया था।
सिर चढकर बोला चाइनीज जायका
चीफ इंजीनियर मरीन अशफाक अहमद खान बताते है कि लखनऊ के लोगों को चाइनीज स्वाद का चस्का गंज में ही लगा। यहां तीन चाइनीज रेस्टोरेंट थे। पहला था चाइना बार एंड रेस्टोरेंट जहां अब फ्लाइंग मशीन जींस एंड जैकेट्स का रिटेल आउटलेट है। दूसरा सिनोम रेस्टोरेंट, यह कैपिटल बिल्डिंग में था। तीसरा चाइनीज रेस्टोरेंट था हांगकांग। ये सब बीते जमाने की बातें हैं। अब सिर्फ जॉनहिंग रेस्टोरेंट ही लखनऊ के लोगों की गंज में चाइनीज व्यंजन परोस रहा है।