किशोरावस्था पहुंचते ही माहवारी शुरू होने के कारण लगभग सभी किशोरियां जागरूकता में कमी के कारण इन दिक्कतों से जूझती हैं क्योंकि उन्हें अपनी मां से भी उन दिनों में मदद नहीं मिलती थी। उन्हें यही बताया गया कि किसी भी माहवारी के बारे में बात न करे। यूनिसेफ और वात्सल्य संस्था ने माहवारी में साफ-सफाई, स्वस्थ्य एवं खुशहाल जीवन बिताने के लिए किशोरियों को जागरूक किया। इन किशोरियों ने मटका इनसिनिरेटर बनाना सीखा जिससे अब उन्हें परेशानी नहीं होती।
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- फोटो : amar ujala
केस 1- गोसाईंगंज ब्लॉक के माढरमऊ गांव की कक्षा 8 की एक छात्रा ऐसे रुढ़िवादी परिवार की सदस्य है जो माहवारी (मासिक धर्म) के बारे में बात करना तक गलत मानते थे। यहां तक की उसकी मां और बहन भी इस बारे में बात करने से हिचकती थीं। वॉश ब्रिगेड ने उसे व परिवार वालों को जागरूक किया। साथ ही उसे मटका इंसिनिरेटर बनाने का प्रशिक्षण दिया।
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केस 2- माल ब्लॉक की एक और छात्रा माहवारी के दौरान दिक्कतों से जूझती थी। उसे अपने पैड छिपाने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। उसे फेंकने के एकांत की जरूरत पड़ती। उसे भी इंसीनिरेटर बनाने का प्रशिक्षण दिया गया, जिसने इन सब दिक्कतों से निजात दिला दी।
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विशेषज्ञों के मुताबिक भ्रांतियों से किशोरियों के शारीरिक ही नहीं मानसिक विकास में भी बाधाएं आती हैं। स्कूल भी जाने में दिक्कत होती है। इसके बावजूद वे अपनी समस्याएं और सवाल किसी से भी पूछ नहीं पातीं। माढरमऊ की छात्रा के मामले में वॉश ब्रिगेड और स्वच्छता टोली ने मदद की।
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10 किशोरों को चुनकर वॉश ब्रिगेड बनायी गई। उन्हें यह बताया गया कि यह एक जरूरी शारीरिक प्रक्रिया है जो कि युवतियों के विकास का एक अभिन्न अंग है। वात्सल्य संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष नीलम सिंह बताती हैं किइस प्रशिक्षण के बाद माढरमऊ की छात्रा ने अपने परिवार वालों की माहवारी से संबंधित भ्रांतियों को दूर किया। यहां तक कि घर में मटके में इंसिनिरेटर बनाया जो उसे हमारे कर्मचारियों ने सिखाया था।
अब यह छात्रा हमारी स्वच्छता टोली की सदस्य है। उसे अब माहवारी के दौरान स्कूल जाने और बाकी के सारे काम करने की छूट है। साथ ही अब गांव आने वालों को स्वच्छता का महत्व समझती है। इससे उसके गांव के स्वच्छता का स्तर सुधरा है। इसी तरह माल ब्लॉक के 87 से अधिक परिवारों में विशेष इंसिनिरेटर का इस्तेमाल किया जा रहा है।