कभी साल भर चलने वाली पतंगबाजी अब मकर संक्रांति या फिर अन्य त्यौहारों तक सिमट कर रह गई है। आधुनिकता और व्यस्तता भरे जीवन के बीच पतंग की डोर दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है। यही कारण है कि छतों पर पेच लड़ाने के साथ ही वो मारा...., वो काटा... का शोर अब पहले जितना नहीं रहा। पतंग दुकानदार भी मानते हैं कि लोगों में पतंगबाजी का शौक कम होता जा रहा है। अब सिर्फ परंपरा को बनाए रखने के लिए लोग त्यौहारों पर पतंग की खरीद करते हैं या फिर जाड़ों के मौसम में लोग इसे उड़ाना पसंद करते हैं। पहले हर चौराहे पर दिखने वाली पतंगों की दुकानें भी अब चुनिंदा गलियों में सिमट गई है। नवाबों का शौक माने जाने वाली पतंगबाजी की डोर को आधुनिकता ने भी कमजोर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।
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पतंगबाजी का शौक
- फोटो : amar ujala
हुसैनगंज के अब्दुल कादिर और हाजी सुबरात ने बताया कि उनकी 50 साल से भी पुरानी दुकान है। उनके दादा और उनके पापा भी यही कारोबार करते थे, लेकिन अब हमारी आगे की पीढ़ी इस कारोबार के सहारे नहीं रह सकती। साल-दर-साल लोगों में पतंगबाजी का शोक कम होता जा रहा है। अब सिर्फ त्यौहारों पर ही बिकती हैं। हालांकि इनका मानना है कि अब लखनऊ में पूरे प्रदेश के विभिन्न जगहों के लोग आकर रहने लगे हैं। उनमें थोड़ा बहुत रुझान अब भी बाकी हैं। पुराने लखनऊ को छोड़ दें तो अन्य क्षेत्रों के लोग जमघट एवं मकर संक्रांति पर या जाड़ों के मौसम में ही पतंग उड़ाते हैं।
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पतंगबाजी का शौक
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यूपी चुनाव की सरगर्मी को देखते हुए मकर संक्रांति पर नेताओं के फोटो और पार्टी के झंड़ों के रंगों वाली पतंगों की खेप आने की संभावना थी, लेकिन आचार संहिता के चलते इस पर रोक लग गई है। चौक के तैयब ने बताया कि शुभकामनाएं देने के लिए विभिन्न पार्टी के नेता आर्डर देकर पतंगे बनवाते हैं, लेकिन इस बार आचार संहिता के कारण ऐसे आर्डर नहीं मिले। उन्होंने बताया कि इसी कारण हमने भी नेताओं के कार्टून वाली पतंगे नहीं बनाईं। उन्होंने बताया कि दीपावली पर नेताओं वाली पतंगे खूब बिकी थी।
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पतंगबाजी का शौक
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चौक स्थित मोहनीपुरवा के आसिफ ने बताया कि सरकारों ने पतंग कारोबारियों के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीद थी, क्योंकि वह खुद पतंगबाजी के शौकीन रहे हैं। उन्होंने बताया कि गुजरात के साथी बताते हैं कि वहां पर सरकार की तरफ से सुविधाएं मिलती हैं। उन्होंने कहा कि पतंग ही एक ऐसा कारोबार है, जिसके स्वरूप और प्रणाली में कोई बदलाव नहीं आया है। यह दो सौ साल पहले भी ऐसे बनाई जाती थी जैसे आज बनाई जा रही है। मशीनों का प्रयोग नहीं होने से मजदूरों को पर्याप्त रोजगार भी मिलता रहता है।
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पतंगबाजी का शौक
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आसिफ ने बताया कि आकार के हिसाब से नाम भी रखे गए हैं। सबसे बड़े पतंग को कनकौवा, उससे छोटे को अद्धी, उसके बाद मंझोली और सबसे छोटे पतंग को पौनताई बोला जाता है। इसमें कनकौवा और अद्धी को युवा उड़ाते हैं और मंझोली व पौनताई को छोटे बच्चे उड़ाते हैं।दुकानदार मानते हैं कि पतंगबाजी का शौक लगातार कम हो रहा है, लेकिन पुराने लखनऊ में अभी थोड़ी रवायत बाकी है। चौक, अमीनाबाद, ठाकुरगंज, गणेशगंज, नदवा जैसे इलाकों में पतंगों की बिक्री आज भी है हालांकि यह पहले से काफी कम होती जा रही है।
मुश्ताक ने बताया कि गुणवत्ता के अनुसार पतंगों के दाम तय किए गए हैं। बाजार में पांच रुपये से लेकर 40 रुपये तक की पतंग उपलब्ध हैं। 35-40 रुपये की पतंगों की विशेषता यह है कि आप अपनी आंखों से जितनी दूर तक देख सकते हैं, उतनी दूर तक पतंग पर नियंत्रण किया जा सकता है। कम दाम वाली पतंगों को 400 मीटर दूर जाने के बाद नियंत्रण नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि 35-40 रुपये वाली पतंगों को बनाने में काफी समय लगता है। इसे दिन भर में 15-20 ही बनाया जा सकता है और इसको अनुभवी लोग ही बना पाते हैं।