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झिझक छोड़िए... खुलकर बात करें पीरियड्स पर, जानें- क्या कहती हैं आज की लड़कियां

Mon, 29 May 2017 08:01 PM IST
रोली खन्ना/अमर उजाला, लखनऊ
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वो सात दिन...। ये दाग...। अलग कमरे में रहना...देखो अचार मत छूना...। छि:...। गंदा...। माहवारी का जिक्र आते ही नाक-भौं सिकोड़ना...।

जैसे कोई अपराध कर दिया हो। न जाने कितना एक लड़की और महिला को सहना पड़ता है। टीवी पर सैनेटरी नैपकिन का विज्ञापन...। कोई आंख झुकाए...तो कोई मुंह उधर फेरे...।

माहवारी...मेंस्ट्रुएशन...पीरियड....ये शब्द आते ही एक चुप्पी-सी छा जाती है। इस पर कोई बात ही नहीं करना चाहता। नतीजा साफ-सफाई पर ध्यान नहीं और इंफेक्शन...।  पीरियड न हों तो क्या हो? ये जीवन चक्र रुक जाएगा। महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं।

क्या वर्जनाओं की बेड़ियों में जकड़े हुए सशक्तीकरण आएगा? छोड़िए शर्म-झिझक...। खुलकर बात कीजिए...। ये दाग बुरे नहीं...। आज वर्ल्ड मेन्स्ट्रुएशन हाइजीन-डे यानी एमएचडी है। पेश है इस मुद्दे पर खास रिपोर्ट
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पूरी दुनिया गलत धारणाओं को तोड़ने में जुटी है...आप पीछे क्यों
देश-दुनिया में पीरियड से जुड़ी गलत धारणाओं को तोड़ने की मुहिम चल रही है। हाइजीन की बात हो रही है। सबसे पहले 2014 में जर्मनी की एक एनजीओ वास यूनाइटेड ने एमएचडी मनाने की शुरुआत की। 270 देश इस अभियान में जुड़ गए। मकसद माहवारी से जुड़े मिथकों को तोड़ना और महिलाओं-बेटियों के स्वास्थ्य पर फोकस करना है। बदलाव भी आ रहा है।

लखनवी युवा भी कहने लगे-ये शर्म गलत है...
सबसे पहले उनकी बात जो कुछ खास कर रहे हैं। खास इसलिए क्योंकि यह युवाओं का ग्रुप है जो वर्जनाओं पर खुलकर बात कर रहा है। ये युवा ‘नो शेम, वो सुर्ख सात दिन’ के नाम से एक ऑनलाइन और ऑफलाइन कैम्पेन चला रखा है। इसका मकसद महीने के उन दिनों होने वाले दर्द और उससे उपजी शर्म को मिटाने की है।
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बेटियां बोलीं-
हमें बात करने में शर्म नहीं, आप भी मत करो
स्टूडेंट एवं सदस्य लखनऊ बुक क्लब की स्वाति सिंह का कहना है कि यह एक जैविक यानी बायोलॉजिक प्रॉसेस है। आसान शब्दों में कहें तो यह प्राकृतिक है।  इसे इतना असहज क्यों लिया जाता है, समझ में नहीं आता। चुप्पी क्यों, छिपाना क्यों और क्यों छिप-छिप कर दर्द सहना...। पुरुष प्रधान मानसिकता से उबरिए और हमें भी उबरने दीजिए। मैं सबसे पूछती हूं कि क्यों करें हम शर्म। (तस्वीरें में बायें से स्वाती सिंह व आली वर्मा)

वहीं, क्लास नाइन की स्टूडेंट आली शर्मा का कहना है कि जी, मुझे मालूम है, उन सात दिनों में हमें क्या कुछ नहीं झेलना पड़ता। हमारे परिवार की महिलाओं ने भी पुराने समय में टैबूज झेले हैं। वह सिर्फ इसलिए, क्योंकि हाइजीन एंड हेल्थ के बारे में उन्हीं ज्यादा नहीं मालूम था। अब सब जानते हैं। पीरियड्स शर्म की नहीं हेल्थ की बात है।

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दसवीं क्लास की स्टूडेंट अग्रिमा सिंह का कहना है कि भला कौन नहीं जानता कि लड़कियां, महिलाएं मेंस्ट्रुएशन के दौर से गुजरती हैं। प्लीज इसको लेकर कोई गलत धारणा मत बनाइए। बिस्तर अलग कर देना, अछूत बना देना, अरे, कौन से दुनिया में जी रहे हैं लोग। मुझे अपने घर में इस पर बात करने में कोई हिचक नहीं। (तस्वीरें में बायें से अग्रिमा सिंह व सना)

दसवीं क्लास की स्टूडेंट सना का कहना है कि गांव ही नहीं शहर में भी अभी लोग टैबूज में उलझे हैं। पीरियड्स में अछूत बना देना, पढ़े-लिखे समाज की सोच हो ही नहीं सकती। यह एक नेचुरल प्रॉसेस है और इसे नेचुरल ही रहने दीजिए।
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‘काली पॉलिथीन’ का डर छोडिए
दस्तक मंच की को-ऑर्डिनेटर वीना राना का कहना है कि ‘नो शेम, वो सुर्ख सात दिन...’ दस्तक मंच और वाटर एड की एक संयुक्त मुहिम है। एक मानसिक खीझ, झुंझलाहट झेल रही एक बच्ची या महिला को जबरदस्ती के बंधनों में बांधना छोड़िए यह कोई अपराध नहीं, एक नेचुरल प्रॉसेस है। इसे धर्म की मान्यताओं या गलत धारणाओं की जंजीरों में जकड़ना गलत है।

पीरियड्स, सैनेटरी नैपकिन या इससे जुड़ी चीजें अब हाइजीन एंड हेल्थ का मुद्दा है। अलबत्ता महिलाएं-लड़कियां दुकानों से खुद जाकर पैड खरीदने में झिझकती हैं।....और ले भी लिया तो तुरंत मुंह से यही निकलता है कि काली पॉलिथीन में रख दीजिए। अब तो हाल यह है कि दुकानदार खुद ही काली पॉलिथीन में रखकर देते हैं। यह जान लीजिए कि आप कोई अपराध नहीं कर रहीं, इसलिए काली पॉलिथीन को न कहना सीखिए।
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अभी तो बस शुरुआत है...
फारुख रहमान खान, रीजनल मैनेजर, वाटर एड इंडिया
35 करोड़ महिलाएं भारत में पीरियड्स के दौर से गुजर रही हैं। इनमें से 11 करोड़ बच्चियों ने पहली बार इस स्थिति का सामना किया है। 2015 में जल मंत्रालय की ओर से मैन्सट्रुएशन हाइजीन मैनेजमेंट पर फोकस किया गया।

2010 में प्लान और 2012 में यूनिसेफ इस पर एक सर्वे कराया। इसके निष्कर्ष यह रहे कि 100 फीसदी लड़कियों-महिलाओं ने कहा कि उनसे कभी इस विषय पर किसी ने बात ही नहीं की। 90 फीसदी महिलाएं-लड़कियां कपड़े का इस्तेमाल करती रहीं।

यह वह दौर था, जब भारतीय जनसंख्या के एक बड़े वर्ग के हाथों में स्मार्ट फोन आ चुके थे। 86 फीसदी लड़कियां तो इस अवस्था के लिए तैयार ही नहीं थीं। सवाल वही है- हेल्थ एंड हाइजीन के इस मुद्दे पर इतनी चुप्पी क्यों?
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ये तो नेचुरल प्रॉसेस है...
क्वीन मेरी हॉस्पिटल की वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. एसपी जैसवार का कहना है कि माहवारी चक्र 28 दिन का माना जाता है और तीन से पांच दिन ब्लीडिंग पीरियड होता है। यह एक फिजियोलॉजिकल प्रॉसेस है यानी हमारे शरीर की एक नेचुरल प्रक्रिया है।

दक्षिण भारत में तो जब पहली बार लड़की की माहवारी शुरू होती है तो वहां इसे किसी समारोह की तरह मनाया जाता है। यह माना जाता है कि अब लड़की एक परिपूर्ण औरत बनने की ओर बढ़ चली है, उसमें मां बनने की क्षमता आ चुकी है।

11 से 13 साल की उम्र में पहली बार का पीरयड आना यानी मीनारकी कहलाता है। यही वह पीरियड होता है, जब बच्चेदानी की झिल्ली फंक्शनिंग मोड में आती है।

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मिथकों से बचें, साफ-सफाई का रखें विशेष ध्यान
- पुराने समय से यह मान्यता चली आ रही है कि माहवारी से लड़कियां या महिलाएं अपवित्र हो जाती हैं। कई जगह तो ऐसी धारणाएं हैं कि इन पांच दिनों तक नहाना नहीं चाहिए। यह गलत है यह, इस पीरियड में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

- यदि किसी वजह से सैनेटरी नैपकिन नहीं खरीद पा रहीं तो सूती कपड़े का इस्तेमाल करें। कपड़ा धोने के बाद धूप में सुखाकर ही इस्तेमाल करें।

- गंदे कपड़े नहीं पहने रहें, रोज बदलना, उन्हें धोना जरूरी है।

- शुरू के दिनों में ज्यादा रक्तस्राव होता है।  24 घंटे में कम से कम दो-तीन बार कपड़े या नैपकिन जरूर बदलें।

-इस दौरान यौन संबंध बनाने से बचें।
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-सामान्य तौर पर पांच दिनों में 30 से 80 एमएल रक्तस्राव होता है। यदि ज्यादा हो रहा है, थक्केजम रहे हैं तो डॉक्टर को दिखाएं।

-इस पीरियड में बच्चियों के खान-पान पर विशेष ध्यान दें। खून की कमी न होने पाए, इसलिए आयरन की गोलियां दें। ध्यान रखिए, बच्ची में खून की कमी आगे चलकर उसके मां बनने और उसके बच्चों के लिए घातक हो सकती है।

- सबसे खास बात, 11 साल की उम्र से पहले बेटी की काउंसलिंग जरूर कर दें। यानी उसे माहवारी के बारे में समझा दें। उसके बैग में नैपकिन रखें, उसे बताएं यह एक सामान्य प्रक्रिया है, यदि ब्लीडिंग शुरू हो तो वह डरे नहीं।

- इस दौरान स्कूल जाना बंद करने, खेलकूद से बचने या रूटीन एक्टिविटी से रोकने की जरूरत नहीं। यहां तक की पीरियड के दौरान एक्सरसाइज भी की जा सकती है।

-पेट दर्द हो सकता है। इसकेलिए डॉक्टर की सलाह से दवा लें।
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