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सर्जरी के अधिकार पर क्यों है रार, पेश है पूरे हालात को बयां करती एक रिपोर्ट...

Sat, 12 Dec 2020 05:14 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आयुष चिकित्सकों को सर्जरी का अधिकार देने के सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडिया मेडिसिन के नोटिफिकेशन के बाद से चिकित्सक दो खेमों में बंट गए हैं। एलोपैथी चिकित्सक इसके विरोध में उतर आए हैं। उनका तर्क है कि मिक्सोपैथी (चिकित्सा विधाओं को आपस में मिलाना) के नतीजे बेहद भयावह होंगे। मरीजों का जीवन खतरे में पड़ेगा। ...तो मॉडर्न चिकित्सा व्यवस्था पर भी मिक्सोपैथी से बुरा प्रभाव पड़ेगा। तो दूसरी तरफ आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सक हैं जो नोटिफिकेशन को जायज ठहरा रहे हैं। आयुर्वेद के चिकित्सकों का कहना है कि सर्जरी की विधा प्राचीन सुश्रुत संहिता में शामिल है। उनकी दलील ये भी है कि जब एलोपैथ के चिकित्सक भी महर्षि सुश्रुत को सर्जरी का जनक मानते हैं तो उन्हें इस विधा से कैसे दूर रखा जा सकता है? वहीं यूनानी के चिकित्सकों का भी दावा है कि उन्हें सर्जरी पढ़ाई जाती है इसलिए उन्हें हक दिया जाना जायज कदम है। बहरहाल मरीजों को तय करना है कि उन्हें किस चिकित्सा पद्धति पर भरोसा है और कहां इलाज कराना चाहते हैं। पेश है पूरे हालात को बयां करती एक रिपोर्ट...
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : amar ujala
विरोध की वजह
एलोपैथिक चिकित्सकों का कहना है कि बिना प्रॉपर टीचिंग और ट्रेनिंग के की गई सर्जरी से चिकित्सा की गुणवत्ता प्रभावित होगी। मरीजों की जान को खतरा रहेगा। उनका यह भी सवाल है कि जब सर्जरी का अधिकार आयुष को मिल जाएगा तो मेडिकल छात्र एलोपैथ में कड़ा प्रशिक्षण क्यों लेंगे? 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आसान शब्दों में जानें क्या है पूरा मामला
- आयुष क्या है?
 आयुर्वेद, योगा, नेचुरोपैथी, यूनानी, सिद्धा, होम्योपैथी को मिलाकर आयुष कहते हैं। इन पद्धतियों की वैधानिक संस्था सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (स्नातकोत्तर आयुर्वेद शिक्षा) होती है।
- क्या कहा गया नोटिफिकेशन में?
 सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन ने गत 20 नवंबर को एक अधिसूचना जारी की। आयुर्वेद के डॉक्टर भी अब जनरल और ऑर्थोपेडिक सर्जरी के साथ आंख, नाक, कान और गले की भी सर्जरी कर सकेंगे। दरअसल भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद (स्नातकोत्तर आयुर्वेद शिक्षा) विनियम, 2016 में संशोधन किया गया। इसके तहत कुल 58 प्रकार की सर्जरी की मंजूरी दी गई। इसमें 39 जनरल सर्जरी हैं जिन्हें आयुर्वेद की शल्य तंत्र श्रेणी में 39 जनरल सर्जरी तो शालाक्य तंत्र श्रेणी में 19 शामिल हैं। 
- शल्य और शालाक्य तंत्र क्या है?
 शल्य तंत्र (सर्जरी): वे बीमारियां जिनमें सर्जरी की जरूरत होती है। मसलन भगंदर, बवासीर आदि।
 शालाक्य तंत्र (ईएनटी) : आंख, नाक, कान, मुंह, गला आदि से संबंधित रोग।
- साधारण शब्दों में कहें तो किन सर्जरी का अधिकार इससे मिला?
  आंख, नाक, कान और गला, दांत की सर्जरी, स्किन ग्राफ्टिंग, ट्यूमर की सर्जरी, हाइड्रोसील, अल्सर, पेट की, स्तन की गांठों, अल्सर, मूत्र मार्ग के रोगों,  ग्लूकोमा, मोतियाबिंद हटाने और कई अन्य प्रकार की सर्जरी करने का अधिकार मिला है।
- कौन सर्जरी कर सकेेगा?
  बीएएमएस आयुर्वेद डॉक्टर स्नातक यूजी डिग्री के बाद आयुर्वेद में तीन वर्षीय स्नातकोतर पीजी डिग्री आयुर्वेद एमएस शल्य ( जनरल सर्जरी), शालाक्य (ईएनटी एवं डेंटिस्ट्री ) और स्त्री रोग और प्रसूति तंत्र (गायनेकोलॉजी) होंगे वे सर्जरी कर सकेंगे।
- क्या अधिकार के साथ शिक्षण व्यवस्था में भी बदलाव किए जाएंगे?
 हां। पाठ्यक्रम में सर्जिकल प्रक्रिया के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल को जोड़ा गया है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
अधिकार पर सरकार का तर्क
कहा जा रहा है इसका गजट नोटिफिकेशन सरकार सात नवंबर 2016 को कर चुकी है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेद की पहचान बनेगी। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा मिलेगा। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर आयुर्वेद अध्ययन के पाठ्यक्रम में संशोधन कर भारतीय चिकित्सा परिषद् संशोधन विनियम 2020 जारी कर आयुर्वेद चिकित्सकों को भी एलोपैथी चिकित्सकों के समान सर्जरी करने का अधिकार दिया है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर
एक नजर में विभिन्न विधाओं में क्या है सर्जरी की व्यवस्था
एलोपैथ
एमबीबीएस के बाद मास्टर ऑफ सर्जरी और मास्टर ऑफ मेडिसिन की पढ़ाई होती है। एमएस अंतिम वर्ष के छात्रों को सर्जरी की इजाजत तभी दी जाती है जब वे पूरी तरह से पारंगत हो जाते हैं।  इसके बाद यह विभिन्न तरह की सर्जरी कर सकते हैं। मास्टर ऑफ सर्जरी की डिग्री लेने वाले सर्जन इसके बाद नीट सुपर स्पेशियलिटी की परीक्षा देकर सर्जरी की विभिन्न विभागों में अलग-अलग प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। 
आयुर्वेद
राजकीय आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में पोस्ट ग्रेजुएट के रूप में सर्जरी के भी कोर्स चल रहे हैं। बीएचयू वाराणसी, एएमयू अलीगढ़, महाराष्ट्र और बेंगलूरू के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में पीजी सर्जरी की पढ़ाई होती है। यह कोर्स शल्य एवं शालाक्य के हैं। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से पढ़ाई पूरी करने वालों को छह माह तक एलोपैथ का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।
यूनानी
यूनानी में सर्जरी विभाग को जराहत कहा जाता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, पुणे, बेंगलूरू स्थित यूनानी मेडिकल कॉलेजों में पीजी का यह कोर्स चल रहा। इसका कोर्स तय है। इसमें सामान्य किस्म की बाह्य सर्जरी के साथ  हड्डी, अल्सर, अपेंडिक्स की सर्जरी सिखाई जाती है। सुपर स्पेशियलिटी वाली सर्जरी नहीं करते हैं। 
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डॉ पीके गुप्ता व प्रोफेसर जेडी रावत - फोटो : अमर उजाला
पहले विधा को गुणावत्तापरक बनाएं, तब मिले इजाजत
आयुर्वेद से परहेज नहीं है। लेकिन आयुर्वेद के सर्जन तैयार करने की तकनीकी का विकास करना होगा। आयुर्वेदिक कॉलेज अपने संसाधन बढ़ाएं। सर्जरी की विधा को गुणवत्तापरक बनाकर जनता का विश्वास जीतें, फिर उन्हें सर्जरी की इजाजत दी जाए। ताकि मरीजों की जान को खतरा ना हो। - डॉ. पीके गुप्ता, आईएमए के पूर्व अध्यक्ष
प्रशिक्षित सर्जन तैयार करने के बाद ही मिले अनुमति
एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में एमबीबीएस के बाद एमएस में सर्जरी की विभिन्न तकनीक, आशंकित खतरे और बचाव के तरीके के बारे में विस्तार से प्रशिक्षण दिया जाता है। मॉडर्न मेडिसिन पूरी तरह से शोध पर आधारित है। शोध के नतीजों के आधार पर सर्जरी की तकनीक विकसित की गई है। आयुर्वेद में सर्जरी के मामले में विस्तृत प्रशिक्षण नहीं है। इसलिए सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडिया मेडिसिन को प्रशिक्षण की गाइड लाइन तैयार करनी चाहिए। अभी आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी की मंजूरी देने से जनहानि की आशंका बनी हुई है। इससे चिकित्सा पद्धति प्रभावित होगी। - प्रोफेसर जेडी रावत, सचिव, आईएम
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डॉ राहुल भरत व डॉ एस.के. पांडे - फोटो : अमर उजाला
एलोपैथी में बेसिक ट्रेनिंग में दस साल लगते हैं
पीजी में सर्जरी से संबंध रखने वाले दूसरे विभागों के पीजी छात्र भी सीधे सर्जरी करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं। ऐसे में सिर्फ छह माह के प्रशिक्षण के आधार पर आयुर्वेद डॉक्टरों को सर्जरी की अनुमति देना चिकित्सा की गुणवत्ता खराब करना है। एलोपैथी में एक डॉक्टर को बेसिक ट्रेनिंग लेने में दस साल लग जाते हैं। अगर उनको सर्जरी की अनुमति मिल गई तो फिर एलोपैथी के कठिन रास्ते से कौन जाएगा। इसलिए शॉर्टकट तरीके से सर्जन पैदा करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है। - डॉ. राहुल भरत, अध्यक्ष, केजीएमयू रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन   

विरोध गलत, मरीज तय करे किससे इलाज कराना है
एमबीबीएस की तरह ही बीएएमएस में साढ़े चार साल का कोर्स और एक साल की इंटर्नशिप होती है। इसमें छह माह एलोपैथी की जानकारी दी जाती है। नाक कान गले और अन्य तरह की सर्जरी का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसका विरोध गलत है। यह मरीजों को तय करने दिया जाना चाहिए कि वह किससे इलाज कराना चाहते हैं। - डॉ. एसके पांडे, आयुर्वेदाचार्य
 

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डॉ विजय सेठ - फोटो : अमर उजाला
आयुर्वेद में भी है एनेस्थीसिया का विभाग
बीएचयू स्थित आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज में एनेस्थीसिया विभाग भी है। इसे संज्ञा हरण नाम दिया गया है। यहां से तैयार होने वाले एनस्थेटिस्ट विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में भी काम कर रहे हैं। आयुर्वेद में गॉल ब्लैडर से लेकर हार्निया, हाइड्रोसील एवं अन्य तरह की सर्जरी के बारे में विस्तार से पढ़ाया जाता है। - डॉ. विजय सेठ, आयुर्वेदाचार्य, विवेकानंद पॉली क्लीनिक 

आयुर्वेद के डॉक्टर पहले भी करते रहे हैं सर्जरी 
आयुर्वेद के डॉक्टर पहले भी सर्जरी करते रहे हैं। शल्य विभाग में छात्रों को एनोरेक्टल, गैस्ट्रिक सहित अन्य तरह की सर्जरी की ट्रेनिंग दी जाती है। प्रदेश में बीएचयू में आयुर्वेद विधा से लंबे समय से सर्जरी हो रही है। क्षार सूत्र के जरिए एनोरेक्टल मरीजों का इलाज मेडिकल कॉलेज में भी किया जा रहा है। जहां संसाधन हैं वहां आयुर्वेद के चिकित्सक सर्जरी कर रहे हैं। इसलिए इसका विरोध नहीं होना चाहिए। आयुर्वेद के जनक सुश्रुत के अष्टांग संग्रह में आठवें अध्याय में सर्जरी के बारे में बताया गया है। कोरोना काल में भी आयुर्वेदिक दवाओं का सभी पद्धति के चिकित्सकों ने प्रयोग किया है। यूपी में बीएएमएस में मॉडर्न मेडिसिन के बारे में भी पढ़ाया जाता है। इसलिए हमें सर्जरी की अनुमति मिलने से मरीजों का काफी फायदा होगा। - डॉ. पीसी सक्सेना, प्रधानाचार्य, राजकीय आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज  
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प्रो. अब्दुल कुरैशी व डॉ अनिरुद्ध वर्मा - फोटो : अमर उजाला
यूनानी चिकित्सा पद्धति में है सर्जरी का प्रावधान
नए प्रावधान से चिकित्सा व्यवस्था में सुधार आएगा। खाली पड़े अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी पूरी होगी। यूनानी पद्धति से भी सर्जरी का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। जराहत के डिग्री लेने वाले चिकित्सक को सर्जरी का अधिकार मिला हुआ है। इतना जरूर है कि सुपर स्पेशियलिटी वाली सर्जरी नहीं की जाती है। शरीर के बाह्य अंगों की सर्जरी आसानी से की जा सकती है। कुछ मामलों में पेट खोल कर सर्जरी करने की अनुमति है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मर्ज किस तरह का है। एएमयू अलीगढ़ में लंबे समय से यह विभाग चल रहा है। - प्रो. अब्दुल कुरैशी, जराहत विभागाध्यक्ष, यूनानी मेडिकल कॉलेज   

होम्योपैथी अपनाएं और सर्जरी से रहें दूर
आयुष में शामिल होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति में बिना सर्जरी इलाज का प्रावधान है। पेट रोग, मानसिक रोग, कैंसर सहित अन्य तमाम गंभीर बीमारियों में भी होम्योपैथी कारगर साबित हुई है। यह मरीजों पर छोड़ देना चाहिए कि उन्हें कहां और किस पद्धति से इलाज कराना है। एलोपैथ के सर्जन सैकड़ों की संख्या में हैं, जिस मरीज को जिस चिकित्सक पर भरोसा होता है वहां सर्जरी कराता है। ऐसे में एलोपैथ के चिकित्सकों को विरोध के बजाय आयुर्वेद चिकित्सकों को साथ लेकर कार्य करना चाहिए। - डॉ. अनिरुद्ध वर्मा, पूर्व सदस्य, केंद्रीय होम्योपैथी काउंसिल   
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