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मनोरोगी बन रहे युवा: पहले पू्छते थे क्या कॅरिअर अपनाएं, अब पूछते हैं क्या बचा रह गया

Thu, 17 Jun 2021 04:50 PM IST
ishwar ashish रोली खन्ना, अमर उजाला, लखनऊ
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पिक्साबे
कोरोना से पैदा हुए हालातों ने युवाओं को दो साल से कॅरिअर की चिंता के ऐसे चक्रव्यूह में फंसाया है, जिससे वे चाहकर भी नहीं निकल पा रहे हैं। अप्रैल में जिस तेजी से संक्रमण की दूसरी लहर आई, उसमें तो कोई कुछ सोच नहीं पाया, क्योंकि लोग बीमारी से ही नहीं उबर पा रहे थे। इसकी रफ्तार थमने के बाद जिंदगी ने जैसे-जैसे रफ्तार पकड़ना शुरू किया, युवाओं का फोकस फिर कॅरिअर पर हो गया। मई से लेकर अब तक कॅरिअर काउंसलर, मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के फोन घनघना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य चिंता का स्तर दो साल में एंग्जाइटी अटैक में बदल गया है। युवाओं से लगातार संवाद जरूरी है।

चिंता इसकी कि मेहनत का क्या परिणाम होगा
इंदिरानगर में किराये का कमरा लेकर दो साल से नीट की तैयारी में जुटे तीन प्रतियोगी छात्र एक साल से मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के संपर्क में हैं। इस साल उनकी चिंता एंग्जाइटी अटैक तक जा पहुंची है। काउंसिलिंग के बाद अब दवाएं भी दी जा रही हैं। दरअसल, इनकी चिंता है कि बोर्ड में प्रमोट कर दिए जाने से प्रतियोगी छात्रों की संख्या बढ़ेगी और कटऑफ ऊपर जाएगा। दो साल से वे नीट की तैयारी कर रहे हैं, उनकी मेहनत का क्या जाने क्या परिणाम निकले।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
कोविड के चलते लखनऊ से बांधाना पड़ा बिस्तर
अयोध्या की छात्रा लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई के बाद यहां रहकर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी। पिछले साल कोविड आया और चला गया, उसने फिर से मेहनत शुरू कर दी। इस साल के हालात में उसे बोरिया बिस्तर समेटकर घर लौटना पड़ा। हालात सामान्य नहीं हैं, परीक्षाओं का भविष्य पता नहीं। अकेली बेटी के अवसाद से घिर जाने से माता-पिता भी परेशान हैं। फिलहाल उसकी भी काउंसिलिंग शुरू हुई है।
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डॉ. रश्मि सोनी - फोटो : amar ujala
दो में से एक युवा मानसिक उथल-पुथल का शिकार
मुस्कुराएगा इंडिया अभियान से जुड़ीं परामर्शदाता डॉ. रश्मि सोनी कहती हैं कि इस वक्त दो में से एक युवा मानसिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। तनाव, घबराहट, डर, अवसाद के आम लक्षण हैं। वहीं, ऑनलाइन सिस्टम में परिवर्तन, अनिश्चितता और सामाजिक परिवर्तन इनके मानसिक स्वास्थ्य में बाधा डाल रहा है। हर हफ्ते यदि दस फोन आते हैं तो उनमें से नौ उनके होते हैं, जो भविष्य को लेकर परेशान हैं। इनमें नीट, जेईई में बैठ रहे युवाओं का प्रतिशत ज्यादा है।

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डॉ. मानिनी श्रीवास्तव - फोटो : amar ujala
छात्र पूछ रहे, नौकरी मिलेगी या नहीं
मनोवैज्ञानिक व मुस्कुराएगा इंडिया अभियान से जुड़ीं परामर्शदाता डॉ. मानिनी श्रीवास्तव कहती है कि विश्वविद्यालय के छात्रों में भी चिंता बढ़ रही है। चिंता उन्हें काउंसिलिंग के लिए खींच कर ला रही है। ज्यादातर युवाओं के सवाल हैं कि कैंपस प्लेसमेंट का क्या होगा, अर्थव्यवस्था जिस ओर जा रही है, उसमें नौकरी मिलेगी या नहीं, यूनिवर्सिटी तो खुल गई, हमारी पढ़ाई का क्या होगा। इंटर्नशिप न कर पाने से परेशान छात्र अवसरों और अनुभवों की कमी को लेकर चिंतित हैं। 
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डीके वर्मा - फोटो : amar ujala
भूतपूर्व स्टेट कॅरिअर काउंसलर डीके वर्मा का कहना है कि इतने बड़े कॅरिअर में मैंने बच्चों को इतना परेशान कभी नहीं देखा। जिन्हें यह सवाल परेशान करता था कि क्या कॅरिअर अपनाएं, अब पूछ रहे हैं कि क्या कॅरिअर रह गया है। हमें कॅरिअर गाइडेंस से पहले इन्हें मनोवैज्ञानिक के पास भेजना पड़ रहा है। रोजाना औसतन ऐसे तीन-चार कॉल आ रही हैं।
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