फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मुस्लिम पक्षकारों ने कहा, रिव्यू याचिका खारिज होना मायूसी भरा, अभी खुले हैं कानून के विकल्प

Fri, 13 Dec 2019 10:50 AM IST
शाहरुख खान ब्यूरो, अमर उजाला, अयोध्या
विज्ञापन
1 of 7
सांकेतिक तस्वीर
विवादित ढांचे के फैसले पर रिव्यू में जाने वाले मुस्लिम पक्षकारों का मानाना है कि अभी न्यायिक प्रक्रिया बंद नहीं हुई है। उन्हें देश के कानून पर पूरा भरोसा है। जल्द ही वकीलों व कानून के जानकारों से मंथन करके नया फैसला लिया जाएगा। पक्षकारों का मानना है कि अगर कोई विकल्प होगा तो उसके तहत फिर से न्याय की गुहार लगाएंगे। गुरुवार को रिव्यू याचिका खारिज होने के बाद अमर उजाला ने मुस्लिम पक्षकारों से बातचीत की है। 
Trending Videos
विज्ञापन

2 of 7
मो. खालिक - फोटो : अमर उजाला
अभी खुले हैं कानून के विकल्प: मो. खालिक
मौलाना महफूजर्रहमान के नॉमनी मो. खालिक का मानना है कि अभी न्यायिक प्रक्रिया बंद नहीं हुई है। अभी और भी कानून के विकल्प खुले हुए हैं। मुस्लिम पर्सनल बोर्ड व कानून के जानकारों के साथ बैठक कर बातचीत की जाएगी। अगर संभव हुआ तो फिर से वाद दायर किया जाएगा।

पेशा व इतिहास- मौलाना महफूजर्रहमान मौलाना वकीलुद्दीन के पुत्र हैं। शुरुआत में मौलाना वकीलुद्दीन की ओर से वाद दायर किया गया था। इनकी मृत्यु के बाद मौलाना महफूजर्रहमान पक्षकार बने। मौजूदा समय में मौलाना महफूजर्रहमान दीनी तालीम का काम कर रहे हैं। 
बजुर्गों के बीच में बैठकर लिया जाएगा फैसला
 
विज्ञापन

3 of 7
मो. उमर - फोटो : अमर उजाला
पक्षकार मो. उमर पांचू का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से याचिका खारिज कर दिए जाने के बाद अब हम लोग बड़े, बुजर्गों में बैठकर चर्चा करेंगे कि आगे क्या करना है। जल्द ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जफरयाब जीलानी से मिलकर निर्णय लिया जाएगा। जो सबकी राय होगी वही काम किया जाएगा। 

पेशा व इतिहास- मौजूदा समय में मो. उमर अयोध्या कोतवाली के निकट एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। यह दुकान विशेषकर अयोध्या में आने वाले मेलार्थियों के लिए है। इसमें मेले की उपयोगी वस्तुएं मिलती हैं। इसके दादा महफूज अहमद विवादित परिसर के नामिनी थे और पंक्चर बनाने का काम करते थे। बाद में इनके पिता फारूख व इसके बाद अब मो. उमर अयोध्या मामले में पक्षकार बने। 

4 of 7
मो. हस्बुल्लाह - फोटो : अमर उजाला
रिव्यू खारिज होना मायूसकुन- मो. हस्बुल्लाह
पक्षकार मुफ्ती हस्बुल्लाह का कहना है कि रिव्यू याचिका खारिज होना मायूसकुन है। उन्हें देश के कानून पर पूरा भरोसा है। कानून की हदों में रहते हुए अगर कोई और विकल्प होगा तो उस पर कार्य किया जाएगा। जल्द ही वकीलों से राय ली जाएगी और कानून की पूरी जानकारी ली जाएगी। 

पेशा व इतिहास- दरअसल मुफ्ती हस्बुल्लाह उर्फ बादशाह खान हाफिज महमूद की वसीयत के आधार पर पक्षकार हुए हैं। हाफिज महमूद मुकदमे के शुरूआती समय में पक्षकार थे। हाईकोर्ट तक वह ही मुकदमे के पक्षकार रहे। इनकी मृत्यु के बाद बाद में वसीयत के आधार पर मुफ्ती हस्बुल्लाह उर्फ बादशाह खान को कोर्ट ने पक्षकार माना। यह फैजाबाद की एक मस्जिद के इमाम हैं। 
 
विज्ञापन

5 of 7
हाजी असद - फोटो : अमर उजाला
वैधानिक अधिकार के तहत गए थे कोर्ट: हाजी असद
पक्षकार हाजी असद बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से मिले वैधानिक अधिकार के तहत रिव्यू याचिका दायर की थी। गुण-दोष के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करना गलत होगा। अब आगे क्या करना है, यह कानूनी सलाह से किया जाएगा। 
पेशा व इतिहास- हाजी असद से पहले इनके पिता हाजी अब्दुल अहद पक्षकार थे। इनकी मृत्यु के बाद इनको पक्षकार बनाया गया है। यह मौजूदा समय में अयोध्या के वश्ष्ठि कुंड वार्ड के पार्षद हैं। शहर की मानिंद हस्तियों में इनकी गिनती है। 
विज्ञापन

6 of 7
फाइल फोटो
हाजी महबूब के पिता ने दायर किया था मुकदमा
हाजी महबूब अयोध्या मामले में मुख्य मुस्लिम पक्षकार हैं। इनके पिता हाजी फेकू ने 22-23 दिसंबर 1949 की रात रामलला के प्राकट्य के समय विवादित मस्जिद के मुतवल्ली थे। उन्होंने ही सबसे पहले रामलला की मूर्ति हटाने की मांग करते हुए अदालत की शरण ली थी। इसके बाद हाजी फेकू के पुत्र हाजी अब्दुल अहद उसके बाद हाजी महबूब ने मस्जिद की दावेदारी जिंदा रखी। हाजी महबूब ने कहा कि हमें अदालत में अपनी बात रखने का पूरा अधिकार था। न्यायिक प्रक्रिया पर हमें कुछ नहीं कहना है। अब अदालत ने जो मुस्लिम पक्ष को जो पांच एकड़ जमीन दी है उसको लेकर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। हमें जमीन कहां दी जा रही है यह बताया जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
फाइल फोटो
पुनर्विचार याचिका की जरूरत नहीं थी: इकबाल
इकबाल अंसारी ने भी पुनर्विचार याचिका खारिज होने को स्वागत योग्य बताया है। कहा कि नौ दिसंबर को आए कोर्ट के निर्णय को पूरे देश ने मान लिया था तो पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का कोई औचित्य ही नहीं थी, लेकिन जिन्होंने याचिका दायर की थी वह जाने, अदालत ने जो किया ठीक ही किया।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें