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जब मंच से लोहिया बोले, 'मैं प्रधानमंत्री नेहरू का विरोधी हूं, जवाहरलाल नेहरू का नहीं'

Fri, 16 Nov 2018 04:12 PM IST
अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ
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लोहिया और जवाहर लाल नेहरू - फोटो : डेमो
जवाहर लाल नेहरू से मतभेदों के चरम पर पहुंचने के कारण डॉ. लोहिया कांग्रेस से अलग हो चुके थे। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बन चुकी थी। लोहिया अक्सर बिना बताए किसी शहर में पहुंच जाया करते थे। पार्टी के लोगों से भी ऐसा ही करने को कहते थे। 
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राम मनोहर लोहिया - फोटो : amar ujala
बात 1953 की है। संयोग से लोहिया लखनऊ में थे। उन्हें मालूम हुआ कि दारुलशफा में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की जिला इकाई की बैठक चल रही है। वह भी बैठक में पहुंचकर चुपचाप सबसे पीछे बैठ गए। पीछे बैठे जिले के नेता लोहिया को पहचान ही नहीं पाए। प्रमुख लोग मंच पर थे। इस कारण उनका ध्यान भी लोहिया की तरफ गया ही नहीं।
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जवाहर लाल नेहरू
समाजवादी बौद्धिक सभा के अध्यक्ष दीपक मिश्र बताते हैं, ‘बैठक में नेहरू को लेकर वक्ता एक से एक टिप्पणियां कर रहे थे। जितने कठोर शब्दों का प्रयोग हो सकता था, कर रहे थे। लखनऊ जिले के एक नेता तो इतने उत्साहित हो गए कि वह नेहरू और लेडी माउंटबेटन के रिश्तों पर टिप्पणियों तक पहुंच गए। लोहिया जी अचानक खड़े हुए और तेज आवाज में बोले, ‘चुप रहो। जो मन में आ रहा है उसे बोलते ही जा रहे हो। नेहरू के बारे में कुछ पता भी है।’ 

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राम मनोहर लोहिया - फोटो : डेमो
पीछे बैठे लोग तो लोहिया को ठीक से पहचानते भी नहीं थे। कुछ ने लोहिया को लेकर भी टिप्पणी शुरू कर दी। पर, तब तक मंच पर बैठे नेताओं ने लोहिया को देख और पहचान लिया था। वे तेजी से मंच से उतरकर डॉ. लोहिया के पास भागते हुए आए और माफी मांगते हुए उन्हें अपने साथ मंच पर लिवा ले गए। मंच पर पहुंचे डॉ. लोहिया का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था। 
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राम मनोहर लोहिया - फोटो : डेमो
वह बोले, ‘राजनीति में व्यक्तिगत आलोचना और स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर किसी के जीवन पर निजी टीका-टिप्पणी ठीक नहीं है। इस तरह की टिप्पणियां वे करते हैं जिनके पास तर्क नहीं होते, विरोधियों की आलोचना के लिए तथ्य नहीं होते। नीति नहीं होती। कम से कम प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के लोगों से मैं विरोधियों पर तर्क हीन और अमर्यादित टिप्पणियों की उम्मीद नहीं करता। आप लोग एक बात ठीक से समझ लें कि लोहिया, प्रधानमंत्री नेहरू की नीतियों का विरोधी है, न कि जवाहर लाल नेहरू का।’
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