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सच हुई अमर सिंह की बात 'बच्चे' नहीं रहे मुख्यमंत्री अखिलेश

Sun, 18 Sep 2016 08:56 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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सपा में आंतरिक कलह के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को क्या हासिल हुआ...। इस पर भले ही हर किसी के अपने-अपने विचार हों पर एक बात तो साबित हो ही गई कि वो पार्टी नेतृत्व के हर फैसले को मानने के लिए मजबूर नहीं हैं।
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वह सरकार चलाने के लिए जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं और किसी की भी नाराजगी की उन्हें फिक्र नहीं है। लगभग चार दिनों तक चले पॉलिटिकल ड्रामे में समझौते के लिए उन्हें भले ही अपने फैसले वापस लेने पड़े हों पर उन्होंने साबित कर दिया कि वह 'रबर स्टैंप' नहीं हैं।
 
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उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद पर चाचा शिवपाल यादव के नाम पर सहमति तो दे दी लेकिन टिकट बांटने में अपने दखल को भी उन्होंने पार्टी नेतृत्व से मनवा लिया।

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अखिलेश ने भ्रष्टाचार के आरोपी व मुलायम के करीबी गायत्री प्रजापति व राजकिशोर को बर्खास्त किया और फिर चाचा शिवपाल के करीबी कहे जाने वाले दीपक सिंघल को मुख्य सचिव पद से हटाकर मैसेज दे दिया कि वह कड़े फैसले करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
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इसके बाद प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाये जाने के बाद अगर वह चुप रह जाते तो यही मैसेज जाता कि वह मुख्यमंत्री भले ही हों पर फैसलों के लिए वह पूरी तरह पार्टी नेतृत्व के दबाव में ही रहते हैं, लेकिन उन्होंने कैबिनेट मंत्री शिवपाल से‌ कई विभाग वापस लेकर कड़ी प्रतिक्रिया की।
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ऐसा नहीं है कि यह पहली बार था जब उन्हें दबाव में लेने की कोशिश की गई। इसके पहले प्रदेश प्रभारी बनने पर संगठन को चुस्त-दुरूस्त करने के नाम पर शिवपाल यादव ने अखिलेश के दो करीबी दोस्तों आनंद भदौरिया व साजन यादव को पार्टी से बाहर कर दिया कर दिया, जिससे उन्हें यही बताने की कोशिश की गई थी कि पार्टी में उनकी नहीं चलने वाली।
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सपा में कौमी एकता दल के विलय पर भी उनकी अनदेखी की गई। जिसकी भूमिका बलराम यादव ने तैयार की थी। जिसके बाद उन्होंने बलराम यादव को तो बर्खास्त किया ही साथ ही कौएद के विलय को भी निरस्त कर दिया।

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2012 के चुनाव में सपा को सत्ता में लाने के लिए बड़ी भूमिका निभाने वाले अखिलेश यह तो समझ ही चुके हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री भले ही मुलायम न बनाया हो पर वह अपनी कोशिशों से ही एक कामयाब नेता बन सकते हैं।

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विवाद सुलझने पर आखिरकार उन्‍होंने मीडिया से बातचीत में कहा था कि वह 'सेल्फ गोल' करने वाले खिलाड़ी नहीं है। मतलब साफ है कि उन्होंने राजनीति के लिए जरूरी परिपक्वता हासिल कर ली है।
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अगर इस पूरे एपिसोड को देखें तो अमर सिंह की बात सच साबित हो ही जाती है कि अखिलेश अब बच्चे नहीं रहे बल्कि करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुख्यमंत्री हैं। हालांकि अखिलेश खुद अमर को पसंद नहीं करते लेकिन अमर की बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
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