नानी दादी के शौक पर क्या कहता है रिसर्च
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सामूहिकता को प्रोत्साहन
जानकार कहते हैं कि बुनाई, कढ़ाई, सिलाई, बेकिंग, बर्ड वाचिंग जैसे शौक की एक और खासियत है कि इन्हें समूह, स्कूल क्लबों या ऑनलाइन कम्युनिटी में भी किया जा सकता है। इससे अपनापन और सामाजिक जुड़ाव बढ़ता है, अकेलापन कम होता है।
साल 2022 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पक्षियों को देखने और सुनने, क्ले आर्ट करने से डिप्रेशन तथा बेचैनी दूर होती है। प्रिंसटन विश्वविद्यालय का एक अध्ययन बताता है कि बागवानी करने से वही खुशी मिलती है, जो बाइक चलाने, घूमने या बाहर खाना खाने से प्राप्त होती है।
पेशे से अधिवक्ता कोमल कहती हैं, “आज आधुनिक जीवन की भाग-दौड़ से लोगों का मन ऊबने लगा है। सबकी इच्छा होती है कि जीवन में थोड़ा धीमापन एवं ठहराव आए। ग्रैंडमा हॉबीज की खास बात यही है कि ये धीमी और वर्तमान पल से जुड़ी हैं। ये किसी थेरेपी की तरह होती हैं, जो सिर्फ कुछ बनाना नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का आनंद लेना सिखाती हैं, चाहे वह बगीचे की देखभाल करना हो या खुद से जैम, अचार बनाना या फिर क्राफ्टिंग करना। हमारी इमोशनल वेल-बीइंग के लिए ये हॉबीज बेहद आवश्यक हैं। इससे एक प्रकार की संतुष्टि आती है।”
दिल्ली में रहने वाली प्रगति चसवाल का कहना है, “आजकल बहुत से लोग दादी-नानी के शौक अपनाते हैं, लेकिन हम इसे बड़ा शौक मानते हैं, क्योंकि ये फोकस बढ़ाने और सोचने-समझने की क्षमता को बेहतर बनाते हैं, आंखों और हाथों के तालमेल को मजबूत करते हैं और सब्र एवं शांति लाते हैं। ये कई तरह से रचनात्मक और टिकाऊ भी हैं। वास्तव में, जब हम अपनी हॉबीज को समय देते हैं तो असल मायनों में खुद को समय दे रहे होते हैं।”
सुकून का भी ये मामला है
क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट डॉ. आरुषि दीवान कहती हैं, डिजिटल दुनिया में जहां हर चीज स्क्रीन और तुरंत मिलने वाले नतीजों पर निर्भर है, ऐसे में धीमे और हाथों से किए जाने वाले काम बच्चों और बड़ों, दोनों को सुकून देते हैं। ये शौक पुरानी पीढ़ी दादी एवं नानी से जुड़ने के साथ ही परिवार की परंपराओं को समझने का मौका भी देते हैं। सोशल मीडिया पर इन गतिविधियों के सुंदर और आकर्षक वीडियोज बच्चों में इनके प्रति रुचि बढ़ा रहे हैं, साथ ही खुद से कुछ नया बनाने और गढ़ने की संस्कृति भी इस ट्रेंड को आगे बढ़ा रही है। इसके अलावा इन कामों की नियमितता और अनुशासन बच्चों को नियंत्रण तथा स्थिरता का अहसास कराती है, जो आज पढ़ाई के दबाव वाले माहौल में जरूरी है। सूत, कपड़े और औजारों को छूने, महसूस करने से बच्चों को सेंसरी बैलेंस मिलता है। कुल मिलाकर, ये शौक रचनात्मकता, तनाव से राहत और परंपरा से जुड़ने का एक अच्छा माध्यम बन गए हैं। ये इंसान की मानसिक मजबूती, भावनात्मक स्थिरता और लचीलेपन को बढ़ा रहे हैं।