पशुपतिनाथ मंदिर का इतिहास
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पशुपतिनाथ मंदिर का इतिहास
पशुपतिनाथ मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन है और इसकी स्थापना का सही समय ज्ञात नहीं है। लेकिन माना जाता है कि लिच्छवी वंश के राजा प्रचंड देव ने मंदिर का निर्माण 5वीं शताब्दी में कराया था। समय-समय पर इसका पुनर्निर्माण हो रहा है। यहां स्थित शिवलिंग को ‘पशुपति’ कहा जाता है।
मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव एक बार हिरण का रूप धारण कर यहां विचरण करने आए थे। देवता उन्हें वापस कैलाश ले जाना चाहते थे पर शिव जी राजी नहीं हुए। इस दौरान उनका सींग टूट गया और शिवलिंग के रूप में स्थापित हुआ। इसी कारण उनका यह स्वरूप पशुपतिनाथ के रूप में पूजा जाता है।
एक कथा उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ ज्योतिर्लिंग से जुड़ी है। मान्यता है कि जब पांडव महाभारत युद्ध के बाद मोक्ष प्राप्ति के लिए भगवान शिव की खोज में निकले तो शिव जी ने बैल का रूप धारण कर लिया। भीम ने उन्हें पहचान लिया और रोकने का प्रयास किया, इस दौरान बैल रूपी शिव का सिर नेपाल के काठमांडू में गिरा और धड़ केदारनाथ में रह गया। मान्यता है कि केदारनाथ की यात्रा तभी पूरी माना जाती है , जब भक्त पशुपतिनाथ मंदिर के भी दर्शन करते हैं।
पशुपतिनाथ में चार मुखों वाला शिवलिंग है, जिसका ऊपरी भाग यानी पाँचवाँ मुख दिव्य लिंग के रूप में पूजा जाता है। हर साल महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें भारत सहित पूरी दुनिया से भक्त शामिल होते हैं। मंदिर परिसर में कई छोटे-बड़े मंदिर, मूर्तियां और आश्रम भी हैं जो इसे और भी विशेष बनाते हैं।