प्रतीकात्मक तस्वीर
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किन्नरों का ग्रुप
वो पढ़ाई कर सके इसके लिए तब मैंने एक बैटरी का इंतजाम किया था। मुझे लगता है कि उस वक्त जो तकलीफें थीं, उनसे हम साथ लड़े, जिस वजह से हमारा रिश्ता और मजबूत हुआ। मुझे खुशी है कि प्रवीण मुझसे ज्यादा पढ़ लिख गया। मेरी मां कहती थी कि पढ़ने-लिखने से दुनिया बदल जाती है। पर प्रवीण के लिए दुनिया नहीं बदली। 'किन्नरों को नौकरी नहीं देंगे', ऐसा कहकर कई लोगों ने प्रवीण को काम पर रखने से मना कर दिया। इसी वजह से प्रवीण ने किन्नरों के समूह में शामिल होने का फैसला किया था। हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। मैं जानता था कि किन्नरों का ग्रुप जॉइन करने का मतलब होगा, शादियों और लोगों की खुशी के मौकों पर गाना गा-बजाकर पैसे मांगना। मुझे आज भी याद है वो दिन, जब मैंने पहली बार निशा (प्रवीण) को गली में तालियां पीटते देखा था। मुझे बहुत दुख हुआ था। लोगों ने, उसके घरवालों ने उसे वैसे ही स्वीकार किया होता, उसकी थोड़ी भी मदद की होती तो वो आज कुछ और कर रही होती। उसे मजबूरी में इस पेशे में न आना पड़ता। हालांकि मैं अब साउंड सिस्टम लगाने का ठेका लेने लगा हूं और हम दोनों मिलकर ठीकठाक कमा लेते हैं। घर चल जाता है।