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कहानी उस हिंदू राजा की जिसने इमाम हुसैन के लिए अपने बेटों की कुर्बानी दे दी

Tue, 10 Sep 2019 05:58 PM IST
ललित फुलारा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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मोहर्रम के जुलूस के दौरान सोगवार - फोटो : अमर उजाला
कर्बला का युद्ध केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि हिंदुओं के एक खास ब्राह्मण वर्ग के लिए भी बहुत मायने रखता है। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि दक्षिण एशिया, खासकर भारत में एक ऐसा हिंदू समुदाय भी रहता है जिसका इमाम हुसैन की लड़ाई से जुड़ाव रहा है। यह समुदाय हुसैनी ब्राह्मण के तौर पर जाना जाता है।
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muharram
कौन हैं हुसैनी ब्राह्मण ?
हुसैनी ब्राह्मण मोहयाल समुदाय के वो लोग हैं जो हिंदू और मुसलमान दोनों से संबंध रखते हैं। वर्तमान समय में यह हुसैनी ब्राह्मण सिंध, पाकिस्तान और अरब के अलावा पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली और भारत के अन्य हिस्सों में रहते हैं। हिस्ट्री ऑफ मुहियाल्स नाम की किताब के मुताबिक, कर्बला के युद्ध के समय 1400 ब्राह्मण उस समय बगदाद में रहते थे।
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Muharram 2018
कर्बला की जंग
इराक की राजधानी बगदाद से 120 किलोमीटर दूर कर्बला एक शहर है। मक्का-मदीना के बाद कर्बला इस्लाम धर्म के लोगों के लिए एक प्रमुख स्थान है। मान्यताओं के अनुसार जब क्रूर बादशाह यजीद ने खुद को इस्लाम धर्म का शहंशाह घोषित किया तो पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे 'हजरत इमाम हुसैन' और उनके अनुयायियों ने मानने से साफ इनकार कर दिया।

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muharram procession - फोटो : अमर उजाला
बादशाह यजीद इस बात को समझ गया था कि हुसैन के जिंदा रहते वह कभी भी शहंशाह नही बन सकता है। इसी वजह से यजीद ने इमाम हुसैन को एक खत लिख जंग का एलान कर दिया। क्रूर शहंशाह बने यजीद को चुनौती देने के लिए इमाम हुसैन इराक वासियों के भरोसे मक्का से अपने परिवार के साथ इराक के लिए निकल पड़े। यजीद की फौज ने धोखे से हुसैन के समर्थकों को इराक में रोक लिया और कर्बला के मैदान में दलजा नदी के किनारे हुसैन के काफिले को भी रोक दिया।
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muharram - फोटो : BASIT ZARGAR, AMAR UJALA
संकट आने पर लोग अपनों को जरूर याद करते हैं। ठीक उसी तरह इमाम हुसैन ने भी इस संकट की घड़ी में मदद के लिए दो खत लिखे। इमाम हुसैन का लिखा एक खत भारत भी पहुंचा। यह खत भारत में हुसैनी ब्राह्मणों के राजा राहिब सिद्धदत्त के लिए लिखा गया था।
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ख्वाजा की दरगाह में हाईदौस का एक नजारा - फोटो : Amar Ujala
कर्बला के युद्ध में भारत की भूमिका
आपको बता दें कि पैगंबर मुहम्मद साहब के काल में हुसैनी ब्राह्मणों के राजा राहिब सिद्धदत्त थे। राजा सिद्धदत्त को सब सुख था पर उनकी कोई औलाद नही थी। पैगंबर साहब के आशीर्वाद से उन्हें 7 बेटों की प्राप्ति हुई। इसका एहसान मानते हुए हुसैनी ब्राह्मण पैगंबर मुहम्मद साहब के अनुयायी हो गए।
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मोहर्रम का जुलूस
हजरत इमाम हुसैन की संकट की खबर जैसे ही राहिब दत्त को मिली, वह अपनी हुसैनी ब्राह्मण की सेना के साथ इमाम हुसैन की मदद के लिए कर्बला निकल पड़े। उनके कर्बला पहुंचने के पहले ही हुसैन शहीद हो चुके थे। इमाम हुसैन की शहीद होने की खबर से इन ब्राह्मणों का हौसला और बढ़ गया। हुसैनी ब्राह्मणों ने यजीद की फौज के साथ संघर्ष किया और जंग में राहिब सिद्धदत्त के सभी पुत्र कुर्बान हो गए।
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